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धर्म किसे कहते है ?

धर्म किसे कहते है ?       जिस प्रकार प्राणों के बिना मनुष्य जीवित नहीं रह सकता, उसी प्रकार धर्म (नैतिक आचरण) के बिना मनुष्य का भी कोई महत्त्व नहीं।      धर्म आचरण की वस्तु है।धर्म केवल प्रवचन और वाद-विवाद का विषय नहीं।केवल तर्क-वितर्क में उलझे रहना धार्मिक होने का लक्षण नहीं है।धार्मिक होने का प्रमाण यही है कि व्यक्ति का धर्म पर कितना आचरण है। व्यक्ति जितना-जितना धर्म पर आचरण करता है उतना-उतना ही वह धार्मिक बनता है।'धृ धारणे' से धर्म शब्द बनता है, जिसका अर्थ है धारण करना। धर्म किसी संगठित लोगों के समुह का नाम नही न ही अभिमान व गर्व करने की वस्तु है ।        धर्म मनुष्य में शिवत्व /पवित्रता की स्थापना करना चाहता है।वह मनुष्य को पशुता के धरातल से ऊपर उठाकर मानवता की और ले जाता है और मानवता के ऊपर उठाकर उसे देवत्व की और ले-जाता है।यदि कोई व्यक्ति धार्मिक होने का दावा करता है और मनुष्यता और देवत्व उसके जीवन में नहीं आ पाते, तो समझिए कि वह धर्म का आचरण न करके धर्म का आडम्बर कर रहा है।     मनु महाराज के अनुसार धर्म की महिमा   ...

धर्म किसे कहते है ?

धर्म किसे कहते है ?       जिस प्रकार प्राणों के बिना मनुष्य जीवित नहीं रह सकता, उसी प्रकार धर्म (नैतिक आचरण) के बिना मनुष्य का भी कोई महत्त्व नहीं।      धर्म आचरण की वस्तु है।धर्म केवल प्रवचन और वाद-विवाद का विषय नहीं।केवल तर्क-वितर्क में उलझे रहना धार्मिक होने का लक्षण नहीं है।धार्मिक होने का प्रमाण यही है कि व्यक्ति का धर्म पर कितना आचरण है। व्यक्ति जितना-जितना धर्म पर आचरण करता है उतना-उतना ही वह धार्मिक बनता है।'धृ धारणे' से धर्म शब्द बनता है, जिसका अर्थ है धारण करना। धर्म किसी संगठित लोगों के समुह का नाम नही न ही अभिमान व गर्व करने की वस्तु है ।        धर्म मनुष्य में शिवत्व /पवित्रता की स्थापना करना चाहता है।वह मनुष्य को पशुता के धरातल से ऊपर उठाकर मानवता की और ले जाता है और मानवता के ऊपर उठाकर उसे देवत्व की और ले-जाता है।यदि कोई व्यक्ति धार्मिक होने का दावा करता है और मनुष्यता और देवत्व उसके जीवन में नहीं आ पाते, तो समझिए कि वह धर्म का आचरण न करके धर्म का आडम्बर कर रहा है।     मनु महाराज के अनुसार धर्म की महिमा   ...

सत्याचरण ही सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है

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  ।।सत्याचरण ही सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है।। आचार्य श्री प्रेम आर्य, वैदिक पुरोहित, गया जी, 9304366018 ओ३म् व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्।            दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धाया सत्यमाप्यते।।                                          य०अ०- १९,मं०-३०  भावार्थ-           (व्रतेन) जो मनुष्य सत्य के आचरण को दृढ़ता से करता है, तब वह दीक्षा अर्थात उत्तम अधिकार के फल को प्राप्त करता है।(दीक्षयाप्नोति०) जब मनुष्य उत्तम गुणों से युक्त होता है, तब सब लोग सब प्रकार से उसका सत्कार करते हैं। क्योंकि धर्म आदि शुभ गुणों से ही उस दक्षिणा को मनुष्य प्राप्त होता है, अन्यथा नहीं।(दक्षिणा श्र०) जब ब्रह्मचर्य आदि सत्यव्रतों से अपना और दूसरे मनुष्यों का अत्यंत सत्कार होता है, तब उसी में दृढ़ विश्वास होता है। क्योंकि सत्य धर्म का आचरण ही मनुष्यों का सत्कार करने वाला है।(श्रद्धया) फिर सत्य के आचरण में जितनी जितनी अधिक ...

धर्म क्या है ?

  धर्म क्या है ?  =============    धर्म वह है जो मनुष्य मात्र का कल्याण करने में समर्थ हो,किसी व्यक्ति या वर्ग विषेश का नहीं।        धर्म वह है जो जीवन के सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त करे।बौद्धिक,आत्मिक,शारीरिक,सामाजिक,राष्ट्रीय उन्नति के लिए प्रेरणा दे;जिसमें समानता,एकता,परस्पर प्रेम,सौहार्द,सद्भावना,समदृष्टि उत्पन्न करने की क्षमता हो;जो कर्तव्य पालन के प्रति सचेत करे।ऐसे धर्म को धारण करके मनुष्य का इहलोक भी सुधर सकता है और परलोक भी।       धर्म के प्रति यह दार्शनिक दृष्टिकोण कितना उदात्त व विशाल है।       यतोअभ्युदयनि: श्रेयसस्सिद्धि स धर्म: ।     जिससे लौकिक और पारलौकिक उन्नति हो,वही धर्म है।       पारलौकिक उन्नति से अभिप्राय आत्मिक और पारमार्थिक उन्नति है,अर्थात् केवल भौतिक उन्नति ही जीवन के लिए आवश्यक नहीं है अपितु आत्मिक उन्नति की आवश्यकता उससे भी कहीं अधिक है।         भौतिक उन्नति शरीर के लिए है और आत्मिक उन्नति आत्मा के लिए है।दोनों प्रकार की उन्नति ही मनुष्य के ...

जीवात्माओं वा मनुष्यों के शरीरों की आकृति व सामर्थ्य में भेद का कारण”

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 ओ३म् “जीवात्माओं वा मनुष्यों के शरीरों की आकृति व सामर्थ्य में भेद का कारण” ========== जीवात्मा जन्म-मरणधर्मा है। ईश्वर की व्यवस्था से इसे अपने पूर्वजन्मों के कर्मानुसार जाति, आयु व भोग प्राप्त होते हैं। इन तीनों कार्यों को प्राप्त करने में यह परतन्त्र है। जीव मनुष्य योनि में जन्म लेने के बाद कर्म करने में तो स्वतन्त्र है परन्तु उनके फल इसे ईश्वर की व्यवस्था से मिलते हैं जिसमें यह परतन्त्र होता है। यह भी ज्ञातव्य है कि मनुष्य योनि उभय योनि होती है। इस योनि में मनुष्य स्वतन्त्रतापूर्वक कर्म करता है और अपने पूर्व किये हुए कर्मों के फलों को भोगता भी है। फलों के भोग में यह परतन्त्र होता है। मनुष्य से इतर सभी योनियां केवल भोग योनियां होती है। इन योनियों में जीवात्मा अपने पूर्वजन्म के कर्मों के फलों का भोग ही करता है। पशु आदि भोग योनियों में वह अपनी बुद्धि से सोच कर कोई धर्म व परमार्थ का कार्य नहीं कर सकता। उसके सभी भोग, अर्थात् सुख और दुःख, ईश्वर से निर्धारित होते हैं। इन भोग योनियों में हमारी मनुष्य योनि की जीवात्मा को भी परजन्म लेकर दुःख न उठाने पड़े, इसीलिये मनुष्य योनि में हमें सत्य...

यदि ऋषि दयानन्द न आते तो क्या होता आर्य समाज मंदिर गया जी

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 ओ३म् “यदि ऋषि दयानन्द न आते तो क्या होता?” ========= ऋषि दयानन्द का जन्म 12 फरवरी, 1825 को गुजरात राज्य के मोरवी जिले के टंकारा कस्बे में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री कर्षनजी तिवारी था। जब उनकी आयु का चौदहवां वर्ष चल रहा था तो उन्होंने अपने  शिवभक्त पिता के कहने पर शिवरात्रि का व्रत रखा था। शिवरात्रि को अपने कस्बे के बाहर कुबेरनाथ के मन्दिर में पिता व स्थानीय कुछ लोगों के साथ उन्होंने रात्रि जागरण करते हुए चूहों को मन्दिर के अन्दर बने हुए बिलों से निकलकर शिवलिंग पर भक्तों द्वारा चढ़ाये गये अन्नादि पदार्थों को खाते देखा था। इससे उनकी शिव की मूर्ति में श्रद्धा, विश्वास एवं आस्था समाप्त हो गई थी। उनमें सच्चे शिव को जानने व प्राप्त करने की इच्छा व संकल्प उत्पन्न हुआ था। उसके बाद उनकी बहिन व चाचाजी की मृत्यु होने पर उन्हें वैराग्य हो गया था। सच्चे शिव को जानने और जन्म व मृत्यु के बन्धन से मुक्त होने के लिए उन्होंने अपनी आयु के बाईसवें वर्ष में गृहत्याग कर दिया था। आरम्भ में वह गुजरात में अनेक स्थानों पर रहकर धार्मिक विद्वानों व योगियों के सम्पर्क में आये थे और उनसे अपने प्रश्नों क...

शुभ विवाह की वर्षगांठ पर, सौ-सौ बार बधाई हो।

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  शुभ विवाह की वर्षगांठ पर, सौ-सौ बार बधाई हो। शुभ विवाह की वर्षगांठ पर, सौ-सौ बार बधाई हो। सदा रहो तुम मिलकर ऐसे, जैसे दूध मलाई हो। तुमने जीवन साथी बनकर इतने वर्ष बिताये हैं। इक-दूजे का हाथ पकड़कर इस मंजिल तक आये हैं। आपस की यह प्रीति हमेशा, हर दिन रात सवाई हो। सदा रहो मिलकर तुम ऐसे, जैसे दूध……… (1) यह आदर्श जीवन तुम्हारा सबको राह दिखाता है। सद्-गृहस्थ ऐसा होता है यह सन्देश सुनाता है। तन-मन-धन से जन-गण- मन की सेवा और भलाई हो। सदा रहो मिलकर तुम ऐसे, जैसे दूध…….. (2) पति-पत्नी दो पहिये समझो, अपने घर की गाड़ी के दोनों ही माली हैं सुन्दर, फूलों की फुलवारी के। जीवन स्वर्ग बने धरती पर, ऐसी नेक कमाई हो। सदा रहो मिलकर तुम ऐसे, जैसे दूध………. (3) सुखद स्वास्थ्य का तुम दोनों के, जीवन को आधार मिले बीते समय प्रभु भक्ति में, परमेश्वर का प्यार मिले ‘पथिक’ चलो सुख की राहों पर, ईश्वर सदा सहाई हो सदा रहो तुम मिलकर ऐसे जैसे दूध मलाई हो शुभ विवाह की वर्षगांठ पर सौ-सौ बार बधाई हो। सदा रहो मिलकर तुम ऐसे, जैसे दूध………. (4)

*क्या मृत्यु के पश्चात श्राद्ध करना ठीक है

 क्या मृत्यु के पश्चात श्राद्ध करना ठीक है ? *वेद में कहा गया है, "भस्मान्तम् शरीरम् ।"*  *और यह अन्तिम क्रिया है । इसके पश्चात कोई क्रिया शेष नहीं रहती है । हां, उन अस्थियों को हम निर्जन स्थान में भूमि मे दबा दें । हम बाद में भी शरीर के लिये कुछ काम परम्परा के नाम पर करते हैं । कोई तीसरे दिन करता है, कोई पांचवें, कोई सातवें, कोई नवें, कोई ग्यारहवें, कोई तेरहवीं और कोई बरसी करता है । वास्तव में जिसकी मृत्यु हो गई, अब उससे हमारा कोई सम्बन्ध नहीं रहा । क्योंकि सम्बन्ध तो शरीर से होते हैं । आत्मा का तो किसी से कोई सम्बन्ध नहीं होता है ।* *मृत्योपरान्त आत्मा नया शरीर धारण कर लेता है । अब हम किसी को भोजन खिलाकर स्वयं तृप्त हो जायें या अपनी आत्मा को प्रसन्न करें यह अलग बात है । किसी दूसरे को खिलाकर तीसरे की तृप्ति होगी यह विचार ही मिथ्या है । क्योंकि भोजन का सम्बन्ध शरीर से है, आत्मा से नहीं । यह भोजन आत्मा को मिलता ही नहीं । जब हम जीवित रहते हैं, तब भी शरीर के लिए खाते हैं, आत्मा के लिए नहीं ।*          *ये शरीर तो आत्मा का साधन है, रथ है, वाहन है और वह भो...

भगवान तुम्हारे दर पे भक्त आन खड़े हैं

  भगवान तुम्हारे दर पे भक्त आन खड़े हैं संसार के बंधन से परेशान खड़े हैं, परेशान खड़े हैं ओ मालिक मेरे ओ मालिक मेरे)- 2 १. संसार के निराले कलाकार तुम्ही हो, सब जीव जंतुओं के सृजनहार तुम्हीं हो हम प्रभुका मन में लिए ध्यान खड़े हैं .... संसार के बंधन... २. तुम वेद ज्ञान दाता,पिताओं के पिता हो वह राज कौन सा है, जो तुमसे छिपा हो हम तो हैं अनाड़ी बालक बिना ज्ञान खड़े हैं संसार के बंधन... ३. सुनकर विनय हमारी स्वीकार करोगे मंझधार में है नैया प्रभु पार करोगे हर कदम कदम पर आके ये तूफान खड़े हैं संसार के बंधन... ४.दुनिया में आप जैसा कहीं ओर नहीं है इस ठौर के बराबर कहीं ठौर नहीं है अपनी तो पथिक यह मंजिल जो पहचान खड़े हैं संसार के बंधन....

आर्य समाज में अंतिम संस्कार की प्रक्रिया बहुत ही सरल और वैदिक परंपराओं के अनुसार होती है।

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  आर्य समाज में अंतिम संस्कार की प्रक्रिया बहुत ही सरल और वैदिक परंपराओं के अनुसार होती है। यहाँ कुछ मुख्य बातें हैं  मृतक को स्नान कराना  मृतक को गंगाजल या स्वच्छ जल से स्नान कराया जाता है। - *वस्त्र पहनाना*: मृतक को स्वच्छ वस्त्र पहनाए जाते हैं। -  - *अर्थी पर रखना*: मृतक को बांस की अर्थी पर लिटाया जाता है और सफेद वस्त्र से ढक दिया जाता है। - *मंत्र उच्चारण*: आर्य समाज के लोग वेदों के आधार पर मंत्र उच्चारण करते हुए समसान घाट पर जाते हैं। -  - *दाह संस्कार*: मृतक का दाह संस्कार किया जाता है। और साथ में सुगन्धित सामग्री से वेद मंत्रों द्वारा आहुति भी दी जाती है। - *अस्थियां एकत्रित करना*: दाह संस्कार के बाद अस्थियों को एकत्रित किया जाता है ।  - *श्राद्ध कर्म*: आर्य समाज में श्राद्ध कर्म नहीं किया जाता है, बल्कि जीवित रहते ही माता-पिता और गुरुओं की सेवा करना ही सच्ची श्रद्धा माना जाता है। आर्य समाज के अनुसार, मृत्यु के बाद शोक मनाने के बजाय जितनी जल्दी हो सके सामान्य जीवन में लौट जाना चाहिए। इसीलिए आर्य समाज में तीसरे दिन ही शांति पाठ सम्पन्न करा दिया जा...

मानव जीवन का लक्ष्य

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  *मानव जीवन का लक्ष्य* संसार में तीन वस्तुएं होती है - साध्य, साधक और साधन । "साध्य'' का अर्थ है, जिसे हम सिद्ध करना चाहते हैं अथवा प्राप्त करना चाहते हैं । ''साधक'' उसे कहते हैं, जो साध्य को प्राप्त करना चाहता है ।  और ''साधन'' उसे कहते हैं, जिसकी सहायता से साधक अपने साध्य तक पहुंच पाता है । वैदिक परिभाषाओं के अनुसार,  ''ईश्वर'' अथवा मोक्ष प्राप्ति साध्य है ।  ''आत्मा'' साधक है ।  और धन, संपत्ति, भोजन, वस्त्र, मकान आदि मोक्ष प्राप्ति के साधन हैं । संसार में कुछ लोग ईश्वर या मोक्ष प्राप्ति के लिए ईमानदारी से पुरुषार्थ करते हैं । वे लोग सच्चे साधक हैं । वे धन, भोजन, वस्त्र, मकान आदि साधन सीमित मात्रा में संग्रहित करते हैं । इन साधनों की सहायता से वेदों एवं दर्शन शास्त्रों की विद्या अर्जित कर वे समाधि लगाते हैं । इनकी सहायता से वे अपने साध्य ईश्वर या मोक्ष तक पहुंच जाते हैं । वही लोग वास्तव में सही दिशा में चल रहे होते हैं । अधिकांश लोग तो साध्य को समझते ही नहीं । जीवन में मात्र भोग करना, धन कमाना, संपत्ति जमा ...

मनचाही संतान* की परमौषधि है - *"ब्रह्मचर्य

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  *"मनचाही संतान* की परमौषधि है - *"ब्रह्मचर्य"*  यदि मनचाही सन्तान चाहते हैं, तो मन, वचन और शरीर से सर्वावस्था में ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें । ब्रह्मचर्य ही वह औषधि है, जिसके पालन से कुल की संस्कार तथा राष्ट्रोन्नति के योग्य सन्तानों को जन्म दिया जा सकता है |   ब्रह्मचर्य से ही मनुष्यों में दिव्य गुणों को निर्माण होता है | मनवाञ्छित सन्तान प्राप्ति के लिए योगेश्वर श्रीकृष्ण एक अद्वितीय उदाहरण हैं | वेद कहता है - "मनुर्भव जनया दैव्यं जनम ।"          अर्थात् मनुष्य बनो । "मननातिति मनुष्यः ।"           विचार कर विवेक से कर्म करने के कारण मनुष्य कहाता है । और दिव्य अर्थात् उत्तमोत्तम गुणों को प्राप्त करें तथा उत्तरोत्तर गुणों से युक्त सन्तानों को जन्म दें ।  परन्तु, यह भी ध्यान रखें । "जो दिव्य गुणों से हीन, असंयमी, व्यभिचारी अर्थात् ब्रह्मचर्यहीन सन्तानों को जन्म देते हैं, वह स्वयं ही लम्पट, अजितेन्द्रिय, वासना के कामी कीडे़ और पशुओं से भी निकृष्ट होते हैं, उनकी सन्तानें, सन्तानें नहीं अपितु एक दुर्घटना होती है ...

वर्ण-व्यवस्था के लाभ गुण-कर्म-स्वभावानुसार,

 *वर्ण-व्यवस्था के लाभ* गुण-कर्म-स्वभावानुसार,  वर्ण-व्यवस्था होने से सब वर्ण अपने-अपने गुण-कर्म और स्वभाव से युक्त होकर शुद्धता के साथ रहते हैं | वर्ण-व्यवस्था के ठीक परिपालन होने से ब्राह्मण के कुल में ऐसा कोई व्यक्ति न रह सकेगा जो कि क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र वाले गुण-कर्म-स्वभाववाला का हो | इसी प्रकार अन्य वर्ण अर्थात क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र भी अपने शूद्ध स्वरूप में रहेगें, वर्णसंकरता नहीं होगी | गुण-कर्मानुसार वर्ण-व्यवस्था में किसी वर्ण की निन्दा या अयोग्यता का भी अवसर नहीं रहता | ऐसी अवस्था रखने से मनुष्य उन्नतिशील होता है, क्योंकि उत्तम वर्णों को भय होगा कि यदि हमारी सन्तान मुर्खत्वादि दोषयुक्त होगी तो वह शूद्र हो जायेगी और सन्तान भी डरती रहेगी कि यदि हम उक्त चाल-चलनवाले और विद्यायुक्त न होगें तो हमें शूद्र होना पड़ेगा | गुण-कर्मानुसार वर्ण-व्यवस्था होने से नीच वर्णों का उत्तम वर्णस्थ होने के लिये उत्साह बढ़ता है | गुण-कर्मों से वर्णों की यह व्यवस्था कन्याओं की सोलहवें और पुरुषों की पच्चीसवें वर्ष की परीक्षा में नियत करनी चाहिये और इसी क्रम से अर्थात ब्राह्मण का ब्राह्मण...

लक्ष्मण रेखा....

 लक्ष्मण रेखा.... लक्ष्मण रेखा आप सभी जानते हैं पर इसका असली नाम शायद नहीं पता होगा । लक्ष्मण रेखा का नाम (सोमतिती विद्या है)  यह भारत की प्राचीन विद्याओ में से जिसका अंतिम प्रयोग महाभारत युद्ध में हुआ था  चलिए जानते हैं अपने प्राचीन भारतीय विद्या को सोमतिती विद्या लक्ष्मण रेखा.. महर्षि श्रृंगी कहते हैं कि एक वेदमन्त्र है--सोमंब्रही वृत्तं रत: स्वाहा वेतु सम्भव ब्रहे वाचम प्रवाणम अग्नं ब्रहे रेत: अवस्ति,, यह वेदमंत्र कोड है उस सोमना कृतिक यंत्र का,, पृथ्वी और बृहस्पति के मध्य कहीं अंतरिक्ष में वह केंद्र है जहां यंत्र को स्थित किया जाता है,, वह यंत्र जल,वायु और अग्नि के परमाणुओं को अपने अंदर सोखता है,, कोड को उल्टा कर देने पर एक खास प्रकार से अग्नि और विद्युत के परमाणुओं को वापस बाहर की तरफ धकेलता है,, जब महर्षि भारद्वाज ऋषिमुनियों के साथ भृमण करते हुए वशिष्ठ आश्रम पहुंचे तो उन्होंने महर्षि वशिष्ठ से पूछा--राजकुमारों की शिक्षा दीक्षा कहाँ तक पहुंची है??महर्षि वशिष्ठ ने कहा कि यह जो ब्रह्मचारी राम है-इसने आग्नेयास्त्र वरुणास्त्र ब्रह्मास्त्र का संधान करना सीख लिया है,, ...

आजादी का सच

 गीत -आजादी का सच ( तर्ज: अपनी आजादी को हम हरगिज़ भुला सकते नहीं )  आर्यों की कुर्बानी को हम , हरगिज़ भुला सकते नहीं । आजादी का सच कहेंगे, सच छुपा सकते नहीं।। सच छुपा सकते नहीं।। १. बाद सन सत्तावन के जब, भारत में उदासी छाई थी फिरंगियों की कूटनीति से, हमने मुंह की खाई थी तब दयानंद स्वामी ने गौरव जगाया देश का हुंकार स्वदेशी स्वराज की सबसे पहले लगाई थी। ये अटल वो सत्य है,जिसको झुठा सकते नहीं।। आजादी का सच कहेंगे ---- २. आजादी के आंदोलन का जब, सच बताया जाएगा  सबसे ज्यादा आर्य थे, जेलों में जिक्र आएगा करते रहे संध्या उपदेश,सहकर के कष्ट जेल में ये कटु वो सत्य है जिसे,जेलर ना भूल पाएगा।  नेहरू मोहानी रिपोर्ट, हम भुला सकते नही।। आजादी का सच ------ ३. परमानन्द महावीर पहुंचे काला पानी में होतीलाल पृथ्वी सिंह सड़ गए काला पानी में  जोते गये कोल्हू में जयदेव और नंद गोपाल, सेलुलर में आहुति दी,रामरखा बाली ने  हैं अमिट ये नाम, हम ये नाम मिटा सकते नहीं।। आजादी का सच--------- ४. बिस्मिल रोशन चढ गये, फांसी भरी जवानी में कोई कसर छोड़ी नहीं, गोरों ने मनमानी में  लाजपत ने ख...

मिलता है सच्चा सुख, भगवान् तुम्हारे चरणों में।

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 मिलता है सच्चा सुख, भगवान् तुम्हारे चरणों में।  यह विनती है पल-पल छिन-छिन, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में।।1।। मिलता है सच्चा सुख भगवान् .................. चाहे वैरी कुल संसार बने, चाहे जीवन मुझ पर भार बने।  चाहे मौत गले का हार बने, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में।।2।। मिलता है सच्चा सुख भगवान् ............... चाहे कष्टों ने मुझे घेरा हो, चाहे चारों ओर अंधेरा हो। पर चित्त न डगमगा मेरा हो, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में।।3।। मिलता है सच्चा सुख भगवान्................. मेरी जिह्वा पर तेरा नाम रहे, तेरी याद सुबह और शाम रहे।  बस काम यह आठों याम रहे, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में।।4।। मिलता है सच्चा सुख भगवान्.................. चाहे कांटों में मुझे चलना हो, चाहे अग्नि में मुझे जलना हो।  चाहे छोड़ के देश निकलना हो, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में।।5।। मिलता है सच्चा सुख भगवान्.......................

ओ३म् नाम के हीरे मोती मैं बिखराऊँ गली गली ले लो रे कोई ओ३म् का प्यारा

ओ३म् नाम के हीरे मोती मैं बिखराऊँ गली गली  ले लो रे कोई ओ३म् का प्यारा  आवाज लगाऊँ गली-गली  ओ३म् नाम के हीरे मोती मैं बिखराऊँ गली गली  माया के दीवानों सुन लो  इक दिन ऐसा आयेगा  धन दौलत और रूप खजाना  यहीं धरा रह जायेगा  सुन्दर काया माटी होगी  चर्चा होगी गली-गली  ओ३म् नाम के हीरे मोती मैं बिखराऊँ गली गली  मित्र-प्यारे और सगे-सम्बन्धी  एक दिन भूल जायेंगे  कहते हैं जो अपना-अपना  आग में तुझे जलायेंगे  दो दिन का ये चमन खिला है  फिर मुरझाए कली-कली  ओ३म् नाम के हीरे मोती मैं बिखराऊँ गली गली  क्यों करता है मेरी-तेरी  तज दे उस  अभिमान को  छोड़ जगत् के झूठे धन्धे  जप ले प्रभु के नाम को  गया समय फिर हाथ न आये  तब पछताये घड़ी धड़ी  ओ३म् नाम के हीरे मोती मैं बिखराऊँ गली गली  जिसको अपना कह-कह के  मूरख तू इतराता है  छोड़ के बन्दे साथ विपत्त/विपद् में  कभी न कोई जाता है  दो दिन का ये रैन-बसेरा  आखिर होगी चला चली   ओ३म् नाम के हीरे मोती मैं बिखरा...

प्रभु सारी दुनियाँ से, ऊँची तेरी शान है। कितना महान् है तू, कितना महान है।।

 प्रभु सारी दुनियाँ से, ऊँची तेरी शान है।  कितना महान् है तू, कितना महान है।। यहाँ वहाँ कोने कोने, तू ही मशहूर है।  निकट से निकट और, दूर से भी दूर है।  तुझमें समाया हुआ, सकल जहान है।। प्रभु सारी दुनियाँ से ऊँची................ तू ही एक मालिक है, सारी कायनात का। फूलों भरी क्यारियों का, तारों की जमात का।  तेरी ही जमीन है ये, तेरा आसमान है।। प्रभु सारी दुनियाँ से ऊँची............... सबने जो रंग देखे, सभी तेरे रंग हैं।  जग में अनेक तेरे, पालन के ढंग हैं।  तुझको तो छोटे बड़े, सबका ही ध्यान है।। प्रभु सारी दुनियाँ से ऊँची.................. जितने भी दुनियाँ में, जीव देहधारी है।  सभी तेरे प्यार के, समान अधिकारी हैं।  'पथिक' सभी को तूने, दिया वरदान है।। प्रभु सारी दुनियाँ से, ऊँची तेरी शान है। कितना महान् है तू, कितना महान है।।

डूबतों को बचा लेने वाले, मेरी नैया है तेरे हवाले।

डूबतों को बचा लेने वाले, मेरी नैया है तेरे हवाले। लाख अपनों को मैंने पुकारा, सबके सब कर गए हैं किनारा।  और देता न कोई दिखाई, सिर्फ तेरा ही अब तो सहारा।  कौन तुझ बिन भँवर से निकाले। मेरी नैया है तेरे हवाले..……....... जिस समय तू बचाने पे आए, आग में भी बचा कर दिखाए।  जिस पर तेरी दया दृष्टि होवे, उसपे कैसे कहीं आँच आए।  आँधियों में भी तू ही सँभाले ।  मेरी नैया है तेरे हवाले....….............. पृथ्वी सागर व पर्वत बनाए, तूने धरती पे दरिया बहाए।  चाँद सूरज करोड़ों सितारे, फूल आकाश में भी खिलाए।  तेरे सब काम जग से निराले।  मेरी नैया है तेरे हवाले.............. बिन तेरे चैन मिलता नहीं है, फूल आशा का खिलता नहीं है।  तेरी मर्जी बिना तो जहाँ में, 'पथिक' पत्ता भी हिलता नहीं है।  तेरे वश में अंधेरे उजाले ।। मेरी नैया है तेरे हवाले..................

प्रभु तेरी भक्ति का वर मांगते हैं। झुके तेरे दर पे वो सर मांगते हैं।।

 प्रभु तेरी भक्ति का वर मांगते हैं।  झुके तेरे दर पे वो सर मांगते हैं।। बुरे भाव से जो न देखे किसी को।  हम आँखों में ऐसी नजर मांगते हैं।। प्रभु तेरी भक्ति का........... पड़े अगर मुसीबत न झोली पसारें। हम हाथों में ऐसा हुनर मांगते हैं।।  पुकारे कोई दीन अबला हमें गर।  घड़ी पल में पहुँचे वो वर मांगते हैं।। प्रभु तेरी भक्ति का............. जो बेताब जुल्म और सितम देखकर हो।  तड़पता हुआ वो जिगर मांगते हैं।।  दुःखी या अनाथों की सेवा हो जिससे ।  प्रभु अपने घर ऐसा जर मांगते हैं।। प्रभु तेरी भक्ति का.............

प्रभु जी इतनी सी दया कर दो, हमको भी तुम्हारा प्यार मिले

  प्रार्थना प्रभु जी इतनी सी दया कर दो, हमको भी तुम्हारा प्यार मिले। कुछ और भले ही मिले न मिले, प्रभु दर्शन का अधिकार मिले । । 1 ।। जिस जीवन में जीवन ही नहीं, वह जीवन भी क्या जीवन है। जीवन तब जीवन बनता है, जब जीवन का आधार मिले।।2।। प्रभु जी इतनी सी दया कर दो...................... सब कुछ पाया इस जीवन में, बस एक तमन्ना बाकी है। हर प्रेम पुजारी के अपने, मन मंदिर में दातार मिले।।3।। प्रभु जी इतनी सी दया कर दो............. जिसने तुमसे जो कुछ मांगा, उसने ही वही तुम से पाया।  दुनिया को मिले दुनिया लेकिन, भक्तों को तेरा दरबार मिले।।4।। प्रभु जी इतनी सी दया कर दो.......... हम जन्म जन्म के प्यासे हैं, और तुम करुणा के सागर हो। करुणानिधि से करुणा रस की, एक बूँद हमें इक बार मिले। ।5।। प्रभु जी इतनी सी दया कर दो.............. कब से प्रभु दर्शन पाने की, हम आस लगाए बैठे हैं। पल दो पल भीतर आने की, अनुमति अनुपम सरकार मिले। ।6।। प्रभु जी इतनी सी दया कर दो.......... इस मार्ग पर चलते-चलते, सदियाँ ही नहीं युग बीत गए। मिल जाए 'पथिक' मंजिल अपनी, हमको भी तुम्हारा द्वार मिले। ।7।। प्रभु जी इतनी सी दया ...