ईश्वर के गुण
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*ईश्वर के गुण*
१) वह चेतन दिव्य शक्ति परमेश्वर एक ही है । अर्थात कोई दूसरा उसके तुल्य वा अधिक नहीं ।
२) वह द्रष्टा है, और सब जगत में परिपूर्ण होकर जड़ तथा चेतन दोनों प्रकार के जगत को देखता है, उसका कोई द्रष्टा (अध्यक्ष) नहीं और वह स्वयं किसी का दृश्य भी नहीं हो सकता है ।
३) वह सर्वज्ञ है, अर्थात् सब कुछ जानता है, और उसका ज्ञान संसार की सब वस्तुओं से प्रकट होता है ।
४) वह सर्वव्यापक है, अर्थात सूक्ष्म से सूक्ष्म और महान् पदार्थ के अन्दर और बाहर ओत-प्रोत है । वह इस ब्रह्माण्ड में पूर्ण (सर्वत्र व्याप्त) हो रहा है । वह सूक्ष्मतर से भी सूक्ष्मतम और महत्तर से भी महत्तम है । इससे कोई सूक्ष्म तथा बड़ी वस्तु न तो है, न होगी और न थी ।
५) वह स्वयं स्थिर है । जैसे एक वृक्ष शाखा, पत्र तथा पुष्पादिकों को धारण करता है, उसी प्रकार परमेश्वर पृथ्वी, सूर्यादि समस्त जगत को धारण करता हुआ, उसमें व्यापक होकर ठहरा हुआ है ।
जैसे आकाश के बीच में सब पदार्थ रहते हैं, परन्तु आकाश सबसे अलग रहता है, अर्थात किसी से बंधता नहीं, इसी प्रकार परमेश्वर को भी जानना चाहिये ।
६) वह सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान है, क्योंकि उसकी महिमा ब्रह्माण्ड के प्रत्येक स्थान और प्रत्येक कार्य से प्रगट होती है तथा वह सृष्टि-निर्माण, संचालन व संहार के लिये आंख-कान-नाक आदि इन्द्रिययुक्त शरीर या अन्य किसी पदार्थ के सहायता की अपेक्षा नहीं रखता । जो कुछ करता है, बिना किसी साधन व व्यक्ति (पैगम्बर-अवतार) की सहायता के करता है ।
७) वह निराकार है, क्योंकि सर्वव्यापक है । उसको इन्द्रियों का विषय नहीं बनाया जा सकता है । अर्थात वह अशब्द, अस्पर्श, अरुप, अगन्ध, अस्वाद, अपाणिपाद, अमल और अयोनि (अकारण) है । तथा न उसकी कोई मूर्ति है और न बन सकती है । उसका रुप और शरीर नहीं है । सर्वव्यापक होने से वह मूर्ति में भी व्यापक है, पर मूर्त्ति वह नहीं । जैसे लोह खण्ड में ताप व्याप्त है, पर लोह खण्ड 'ताप' नहीं ।
यदि साकार होता तो, व्यापक न होता, व्यापक न होता तो सर्वज्ञादि गुण भी ईश्वर में न घट सकते, क्योंकि परिमित वस्तु में गुण कर्म स्वभाव भी परिमित रहते हैं तथा शीत-उष्ण, राग-द्वेष, सुख-दुःख तथा भूख-प्यास, रोग-दोष और छेदन-भेदन से रहित न हो सकता ।
८) वह अजन्मा और निर्विकार है, अर्थात वह मनुष्य के समान जन्म, बाल्य, तारुण्य, प्रौढ़ता, वार्धक्य, मरण में नहीं आता ।
उसका जन्म नहीं होता क्योंकि उसने जन्म के हेतु कर्म नहीं किये तथा उसको जन्म देने वाला कोई नहीं । जो पदार्थ जन्म ग्रहण करता है, उसमें ही षड्भाव विकार होते हैं, वही विकारी होता है । ईश्वर विकारी नहीं, इसलिये अजन्मा है ।
९) वह एकरस है, उसमें कभी परिवर्तन नहीं होता । यदि वह परिवर्तनशील होता, तो दूसरी वस्तुओं में परिवर्तन न कर पाता तथा निर्विकार न होता, परिणामी होता ।
१०) ईश्वर का अवतार नहीं होता है । उन्नत स्थान से निम्न स्थान को पहुँचना अवतार है, और यह कर्म गतियुक्त पदार्थ में ही सम्भव है । ईश्वर सर्वव्यापक व अचल है, इसलिये उसका अवतार मानना ठीक नहीं है । परमेश्वर का आना-जाना और जन्म-मरण कभी सिद्ध नहीं हो सकते । क्योंकि इसका भाव है, "ईश्वर का परिमित समय के लिए देहधारी बनना" यह ईश्वर के सर्वज्ञत्व, सर्वव्यापकत्व आदि गुणों के विरुद्ध है ।
उपरोक्त लक्षण सहित परमेश्वर ही को यथावत जानकर मनुष्य ज्ञानी होता है, अन्यथा नहीं ।
उसी को जान के और प्राप्त होके जीव जन्म-मरण आदि क्लेशों के समुद्र समान दुःख से छुटकर परमानन्द-स्वरुप मोक्ष को प्राप्त होता है । अन्यथा किसी प्रकार से मोक्षसुख नहीं हो सकता । मोक्ष को देने वाला एक परमेश्वर के अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है ।
*अजन्मा*:- ईश्वर को वेद में अजन्मा कहा गया है ।
ऋग्वेद में,
अजो न क्षां दाधारं पृथिवीं तस्तम्भ द्यां मन्त्रेभिः सत्यैः ।
वह अजन्मा परमेश्वर अपने अबाधित विचारों से समस्त पृथिवी आदि को धारण करता है ।
यजुर्वेद में कहा है, ईश्वर कभी भी नस-नाड़ियों के बन्धन में नहीं आता अर्थात् अजन्मा है ।
ईश्वर को जन्मा मानने में अनेक ऐसी बातें जुड़ी हुई है, जो ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव के विपरित है । जो जन्मता है, वह मृत्यु को भी अवश्य प्राप्त होता है तथा जन्म के साथ ही शरीर आदि में होने वाले दुःखों को सहना पड़ता है, जिससे ईश्वर को आनन्दस्वरुप नहीं माना जा सकेगा और जो इस प्रकार से जन्म-मरण के चक्र में पड़ने वाला होगा उसे न तो सर्वव्यापक ही कहा जा सकता है और ना ही सर्वशक्तिमान ।
वेदों में वर्णित ईश्वर के स्वरुप में उसके एक गुण का दूसरे गुण से ऐसा मेल है कि एक गुण से दूसरा गुण स्वतः ध्वनित होने लगता है | सच्चिदानन्द होने से वह निराकार है, क्योंकि आकार का तात्पर्य है सावयव होना और सावयव कभी भी सर्वशक्तिमान नहीं हो सकता क्योंकि अवयवों का संयोग बिना दूसरे के किए नहीं हो सकता ।अतः ईश्वर निराकार है और निराकार होने से वह सर्वशक्तिमान है । सर्वशक्तिमान होने से वह न्यायकारी है और न्यायकारी होने से दयालु तथा अजन्मा है । क्योंकि जो जन्म-मरण वाला हो वह सर्वशक्तिमान नहीं हो सकता न आनन्द स्वरुप ही हो सकता है ।
*अनन्त*:- अजन्मा होने से ईश्वर अनन्त है, क्योंकि जन्म मृत्यु की अपेक्षा रखता है, मृत्यु अर्थात् अन्त और जन्म एक दूसरे की पूर्वापर स्थितियाँ हैं | अतः ईश्वर अनन्त अर्थात् अन्त से रहित है ।वेद में ईश्वर को अनन्त बताते हुए कहा है,
अनन्त विततं पुरुत्रानन्तम् अनन्तवच्चा समन्ते ।
अनन्त ईश्वर सर्वत्र फैला हुआ है ।
*निर्विकार*:- अजन्मादि गुणों की पुष्टि के लिए वेद में ईश्वर को निर्विकार कहा है, क्योंकि विकारादि जन्म की अपेक्षा रखते हैं और ईश्वर को 'अज' अर्थात अजन्मा कहा है । अतः वह निर्विकार अर्थात् शुद्धस्वरुप है ।वेद की इसी मान्यता के आधार पर महर्षि पातञ्जलि ने योग दर्शन में लिखा है-
'क्लेशकर्म विपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविषेश ईश्वरः |'
जो अविद्यादि क्लेश, कुशल-अकुशल, इष्ट-अनिष्ट और मिश्रफल दायक कर्मों की वासना से रहित है वह सब जीवों से विषेश ईश्वर कहाता है ।
*अनादि*:- ईश्वर का कोई आदि नहीं है, इसलिए वह अनादि है, क्योंकि आदि के साथ अन्त भी लगा होता है, जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु भी अवश्य होती है और जिसकी उत्पत्ति होती है, उसका विनाश भी अवश्य होता है । इस विषय में यह विचार करना भी आवश्यक है कि आदि और अन्त क्या है ? वास्तव में किसी तत्व के प्रकट होने को उत्पन्न होना कहा जाता है और उसका अप्रकट हो जाना अन्त कहलाता है | जब परमाणुओं के विशेष संयोग से कोई विशिष्ट वस्तु प्रकट होती है, तब उस वस्तु की उत्पत्ति मानी जाती है और परमाणुओं के विखण्डित हो जाने को ही उस वस्तु का नष्ट होना कहा जाता है ।
सामवेद में,
"जजुषा सनादसि"
ईश्वर सनातन(अनादि) है ।
*अनुपम*:- वेद के अनेक मन्त्रों में ईश्वर को अनुपम कहा है | उसके समान शक्ति सम्पन्न अन्य कोई नहीं, इसलिए वह अनुपम है । सामवेद में कहा है,
न कि इन्द्र त्वदुत्तरं न ज्यायो अस्ति वृत्रहन् ।
न क्येवं यथा त्वम् ।।
ईश्वर के समान न ही तो कोई श्रेष्ठ है और न ही उससे ज्येष्ठ है ।
अथर्ववेद में कहा है,
'तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे'
संसार में कुछ भी ऐसा नहीं है जिससे ईश्वर की उपमा दी जा सके इसलिए वह अनुपम है ।
*सर्वाधार*:- वेद की चारों मन्त्र संहिताओं में ईश्वर को समस्त चराचर जगत एवं जीवों का आधार कहा गया है अर्थात् समस्त पृथ्वी आदि लोक-लोकान्तर उसी के आधार पर टिके हैं, इसलिए वह सर्वाधार है ।
परमात्मा की शक्ति का वर्णन करता हुआ उपनिषद कहता है, "सूर्य, चन्द्रमा, तारे, बिजली और अग्नि ये सब ईश्वर में प्रकाश नहीं कर सकते किन्तु इन सबको प्रकाशित करने वाला एक वही ईश्वर है ।"
ऋग्वेद में कहा है-
स दाधार पृथ्वीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ।
ईश्वर पृथ्वी और द्युलोक दोनों का आधार है, वही सबका आधार है ।
प्रश्न:-जब ईश्वर सबका आधार है तब ईश्वर का आधार क्या है?
उत्तर:-ईश्वर सबका आधार होने के साथ-साथ स्वयं अपना भी आधार है, क्योंकि आधार उसको कहा जाता है, जो सर्वशक्तिमान है | इसलिए वह सबका आधार है और उसका अन्य कोई आधार नहीं हो सकता क्योंकि किसी का आधार उससे अधिक शक्तिशाली ही होता है, लोक में भी हम देखते हैं कि प्रत्येक निर्बल अपने से सबल के आश्रय में ही रहता है, और कोई भी अपने से निर्बल के आश्रय में नहीं रहता है | इसी प्रकार क्योंकि ईश्वर से अधिक शक्ति सम्पन्न अन्य जीवादि कोई नहीं, इसलिए उसका कोई आधार नहीं ।
एक राज्य में सब राजा के आश्रित होते हैं, किन्तु राजा किसी के आश्रित नहीं होता | इसी प्रकार ईश्वर भी सर्वाधार है ।
आईये वेद विदित ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना एवं उपासना सब मिलकर करें |
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