संदेश

उपदेश लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मैं नहीं, मेरा नहीं, ये तन किसी का है दिया जो भी अपने पास है, वो धन किसी का है दिया

 मैं नहीं, मेरा नहीं, ये तन किसी का है दिया जो भी अपने पास है, वो धन किसी का है दिया देने वाले ने दिया, वो भी दिया किस शान से मेरा है ये लेने वाला, कह उठा अभिमान से मैं - मेरा यह कहने वाला, मन किसी का है दिया मैं नहीं, मेरा नहीं, ये तन किसी का है दिया जो भी अपने पास है, वो धन किसी का है दिया जो मिला है वो हमेशा, पास रह सकता नहीं कब बिछुड़ जाये ये कोई, राज कह सकता नहीं जिन्दगानी का खिला, मधुवन किसी का है दिया मैं नहीं, मेरा नहीं, ये तन किसी का है दिया जो भी अपने पास है, वो धन किसी का है दिया जग की सेवा, खोज अपनी, प्रीति उनसे कीजिये जिन्दगी का राज है ये, जान कर जी लीजिये साधना की राह पर, साधन किसी का है दिया मैं नहीं, मेरा नहीं, ये तन किसी का है दिया जो भी अपने पास है, वो धन किसी का है दिया

ओम का जप और ध्यान

 ओम का जप और ध्यान दोनों ही लाभकारी हैं, पर दोनों अलग-अलग स्तर पर काम करते हैं। एक को दूसरे से बेहतर कहना सही नहीं होगा, क्योंकि एक दूसरे की सीढ़ी है। 1. ओम का जप क्या करता है? जप यानी ओम को आवाज के साथ, धीरे-धीरे या मन ही मन दोहराना। कैसे काम करता है: यह मन को एक ही बिंदु पर बांध देता है। जब आप लगातार ओम बोलते हैं, तो दिमाग के बाकी हजार विचार अपने आप शांत होने लगते हैं। लाभ: • मन तुरंत शांत और स्थिर होता है, घबराहट और गुस्सा कम होता है • सांस की लय ठीक होती है, शरीर में कंपन से नर्वस सिस्टम रिलैक्स होता है • जिसका मन बहुत भटकता है, उसके लिए शुरुआत करने का सबसे आसान तरीका है  जप एक सक्रिय अभ्यास है, आप कुछ कर रहे हैं। 2. ओम का ध्यान क्या करता है? ध्यान में आप ओम का जप बंद करके, सिर्फ ओम के अर्थ, उसके कंपन या उसके बाद बची हुई शांति पर टिक जाते हैं। यहाँ बोलना नहीं है, सिर्फ सुनना और होना है। कैसे काम करता है: जप से मन जब तैयार हो जाता है, तब ध्यान में आप साक्षी बन जाते हैं। लाभ: • गहरे स्तर का तनाव, पुरानी थकान निकलती है • आत्म-बोध, एकाग्रता और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है • ...

विषय=परमात्मा के अतिरिक्त किसी अन्य को परमात्मा का प्रतीक मान लेना ,उसको पूजना मूर्खता है?*

 *"मूर्खस्य नास्ति औषधम्*" *विषय=परमात्मा के अतिरिक्त किसी अन्य को परमात्मा का प्रतीक मान लेना ,उसको पूजना मूर्खता है?* मित्रों, आजकल भक्ति का एक नया दौर चल रहा है,लगभग  50 साल पूर्व इस प्रकार को  शुरुआत ओशो ने की और तरह तरह के संगीत के साथ नाचने को  ध्यान ,भक्ति का नाम दिया। इसी कड़ी में आगे जुड़ गए इस्कॉन ,इन्होंने कृष्ण कृष्ण की धुनों के साथ उछल कूद को ही असली भक्ति,ईश्वर उपासना , प्रार्थना करार दे दिया । फिर श्री श्री 1008 रविशंकर और अन्य धर्मगुरु क्यों पीछे रहते , उन्होंने भी गोपाला गोपाला ,राधे राधे आदि की संगीत की धुनों पर  नाचने के लिए प्रेरित किया ,इसको भक्ति बता दिया स्वयं भी मैदान में आकर भक्तों का उत्साहवर्धन किया। राधा कृष्ण के नाच गाने वालों का तो कहना ही क्या अनगिनत है।आजकल भागवत कथा सुनाने वाले पंडित भी कथा के बीच में महिला  श्रोताओं के नाचने का आनंद लेते है। मुस्लिम समाज में भी ,खासतौर पर सूफी संगीत भी जोर जोर से सिर हिलाने ,बालों को बिखेरकर उछाल कूद को भक्ति कहते   है, जिसमें हिंदू भी अल्ला हु अल्ला हु पर नाचते हैं। इसके अलावा मा...

परिवार व अन्य किसी स्नेही व्यक्ति का संबंध हम से अचानक छूट सकता है”

चित्र
 ओ३म् “परिवार व अन्य किसी स्नेही व्यक्ति का संबंध हम से अचानक छूट सकता है” ========= मनुष्य सामाजिक प्राणी है। समाज में हम जिन लोगों से परिचित हैं वह सभी वर्तमान में अपनी-अपनी आयु के किसी चरण या सोपान पर है। मनुष्य की भी एक औसत आयु है तथा इसी प्रकार से अन्य प्राणियों की भी अधिकतम आयु होती है। मनुष्य की अधिकतम आयु एक सौ वर्ष या अपवादों में इससे कुछ अधिक होकर लगभग 125 वर्ष तक हो सकती है। बहुत से लोग तो 50 से 70 के मध्य ही काल कवलित हो जाते हैं। जब हम अपने परिवार के सदस्यों के साथ रहते हैं तो हमें कभी इस बात का ध्यान नहीं होता कि हममें से अचानक परिवार के सदस्य का हमसे वियोग हो सकता है। ऐसा होता है कि कुछ लोग लम्बी अवधि तक रुग्ण रहें और उसके बाद उनकी मृत्यु हो और ऐसा भी देखा जाता है कि कभी अचानक ही कुछ शारीरिक विकृति व रोग आ जाता है और देखते ही देखते कुछ दिनों या महीनों में किसी सदस्य का प्राणान्त हो जाता है। हम ऋषि दयानन्द का जीवन देखते हैं तो बाल्यकाल में ही उनकी एक बहिन को अचानक हैजा होता है और वह उसी दिन कुछ घंटों बाद काल कवलित हो जाती है। इसके बाद उनके चाचा जी अचानक काल कवलित हो ज...

चन्द्रशेखर आजाद देश के महान बलिदानी एवं युवाओं के प्रेरक हैं

चित्र
 ओ३म् “चन्द्रशेखर आजाद देश के महान बलिदानी एवं युवाओं के प्रेरक हैं” ============= शहीद चन्द्रशेखर आजाद जी का जन्म २३ जुलाई १९०६ को तथा बलिदान २७ फरवरी १९३१ को हुआ था। वह भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के क्रान्तिकारी व स्वतंत्रता सेनानी थे। चन्द्रशेखर जी शहीद राम प्रसाद बिस्मिल व शहीद भगत सिंह के समान क्रान्तिकारियों के प्रमुख मित्रों व साथियों में से थे। सन् १९२२ में गाँधीजी द्वारा असहयोग आन्दोलन को अचानक बन्द कर देने के कारण उनकी विचारधारा में बदलाव आया और वे क्रान्तिकारी गतिविधियों से जुड़ कर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य बन गये। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने ऋषि दयानन्द के भक्त एवं क्रान्तिकारी राम प्रसाद बिस्मिल जी के नेतृत्व में पहले ९ अगस्त १९२५ को काकोरी काण्ड किया और फरार हो गये। इसके पश्चात् सन् १९२७ में बिस्मिल जी के साथ ४ प्रमुख साथियों के बलिदान के बाद उन्होंने उत्तर भारत की सभी क्रान्तिकारी पार्टियों को मिलाकर एक करते हुए हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का गठन किया तथा भगत सिंह के साथ लाहौर में लाला लाजपत राय की मौत का बदला सॉण्डर्स की हत्या करक...

आइए श्री कृष्ण के महान चरित्र को जानकर हम भी अपने जीवन मे अपनाने का संकल्प लें।

 *श्रीकृष्ण*  (जन्माष्टमी पर विशेष)     आइए श्री कृष्ण के महान चरित्र को जानकर हम भी अपने जीवन मे अपनाने का संकल्प लें। *श्रीकृष्ण का महान व्यक्तित्व* *१.जुए के विरोधी:-* वे जुए के घोर विरोधी थे। जुए को एक बहुत ही बुरा व्यसन मानते थे। जब वे काम्यक वन में युधिष्ठिर से मिले तो उन्होनें युधिष्ठिर को कहा- *आगच्छेयमहं द्यूतमनाहूतोsपि कौरवैः।* *वारयेयमहं द्यूतं दोषान् प्रदर्शयन्।।* -(वनपर्व १३/१-२) अर्थ:-हे राजन्! यदि मैं पहले द्वारका में या उसके निकट होता तो आप इस भारी संकट में न पड़ते। मैं कौरवों के बिना बुलाये ही उस द्यूत-सभा में जाता और जुए के अनेक दोष दिखाकर उसे रोकने की पूरी चेष्टा करता। *२. मदिरा(शराब) के विरोधी:-* वे मदिरापान के घोर विरोधी थे। उन्होंने यादवों के मदिरापान पर प्रतिबन्ध लगा दिया था और उसका सेवन करने वाले के लिए मृत्युदण्ड की व्यवस्था की थी। *अद्यप्रभृति सर्वेषु वृष्ण्यन्धककुलेष्विह।* *सुरासवो न कर्त्तव्यः सर्वैर्नगरवासिभिः।।*  मौसलपर्व *यश्च नोsविदितं कुर्यात्पेयं कश्चिन्नरः क्वचित्।* *जीवन् स कालमारोहेत् स्वयं कृत्वा सबान्धवः।।* -(मौसलपर्व १/२९,३...

आठ प्रकार के कसाई

चित्र
                     आठ प्रकार के कसाई अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी। संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेति घातकाः॥ *अनुमन्ता*  - पशु  को मारने की आज्ञा देने वाला । *विशसिता* - मांस को काटने वाला । *निहन्ता*    - पशु को मारने वाला । *क्रेता*        - पशु को मारने के लिए खरीदने वाला । *विक्रेता*    - पशु को मारने के लिए बेचने वाला ।  *संस्कर्ता*   - पकाने वाला । *उपहृर्ता*    - परोसने वाला । *खादक:*   - खाने वाला । ये सभी        - *कसाई , हत्यारे, और पापी हैं ।* *सभी की मानसिकता और विचारो का अलग अलग होना स्वाभाविक है*  *क्योंकि कोई मांस खाने वाला है , कोई अंडे खाने वाला है ओर कोई सब्ज़ियाँ खाने वाला है* *और खाने का निश्चित रूप से हमारी इंद्रियो पर विशेष प्रभाव पढ़ता है मुख्यता: मन पर*  *जैसा खाओ अन्न , वैसा रहे मन ओर जिसका जैसा अन्न रहेगा उसका वैसा मन रहेगा , वैसे ही विचार रहेंगे वैसे ही स्वभाव रहेगा*  *और एक और बा...

वेदों में, ईश्वर को *दयालु एवं न्यायकारी* कहा गया है ।

 वेदों में, ईश्वर को *दयालु एवं न्यायकारी* कहा गया है । ईश्वर दयालु इसलिए है कि वे प्रत्येक उस व्यक्ति को उसके द्वारा किये गये पाप कर्म का दण्ड अवश्य देते हैं, जिससे वह व्यक्ति आगे उस पाप कर्म को न करे ।  इसे दयालुता ही तो कहेगें, नहीं तो पापी व्यक्ति को दण्ड ना मिले तो दिन-प्रतिदिन बड़े से बड़ा पाप करने में वह सलंग्न रहेगा, जिससे की सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था नष्ट हो जायेगी ।  और न्यायकारी इसलिए कहा गया है कि किसी को भी उतना ही दण्ड मिलता है, जितने उसने पाप किया है | आज कुछ अज्ञानियों ने ईश्वर की न्याय व्यवस्था को न समझ कर शनि की मूर्ति पर तेल चढ़ाने से पापों का क्षमा होना प्रचारित कर दिया है । यह ना केवल ईश्वर की कर्म फल व्यवस्था का अपमान है, अपितु अपने आपको भी मुर्खता के घोर अंधकार में रखने के समान है । तेल चढ़ाने से ना तो कोई पाप कर्म क्षमा होता है, और ना ही अपने द्वारा किये गये पापों के कारण मिलने वाले दण्ड से मनुष्य बच पाता है । आप अपनी तर्कशील बुद्धि का प्रयोग कर स्वयं निर्णय करें कि वे सत्य का वरण करना चाहेगें, अथवा असत्य का वरण करना चाहेगें । और यही सत्यार्थ प्रकाश का...

ईश्वर का सत्ता

 *ईश्वर का सत्ता* "श्रदस्मै धत्त स जनास इन्द्रः  |"            (ऋ० २/१२/५)            हे मनुष्यो ! इस परमेश्वर पर श्रद्धा करो वह परमैश्वर्यवान प्रभु है । नास्तिक वैज्ञानिक कहते हैं,  ईश्वर की सिद्धि प्रयोगशाला में हो, तो हम ईश्वर के सत्ता को मानने को तैयार हैं अन्यथा नहीं । इनकी यह धारणा ठीक नहीं ।ईश्वर सृष्टि और शरीररुपी प्रयोगशाला में सिद्ध होता है । महर्षि दयानन्द जी ने सत्यार्थ प्रकाश में लिखते हैं, इन्द्रियों और मन से गुणों का प्रत्यक्ष होता है गुणी का नहीं । पांचों इन्द्रियों से स्पर्श, रुप, रस, गन्ध का ज्ञान होने से गुणी जो पृथ्वी है, उसका आत्मायुक्त मन से प्रत्यक्ष किया जाता है, वैसे इस प्रत्यक्ष सृष्टि की रचना विशेष में ज्ञानादि गुणों के प्रत्यक्ष होने से परमेश्वर का भी प्रत्यक्ष है । शरीर की अद्भुत रचना को देखकर ईश्वर की सत्ता का प्रत्यक्ष होता है । *संसार परमात्मा में स्थित है।* श्वेतकेतु की समझ में नहीं आ रहा था कि यह नाना रुपों वाला जगत मात्र एक ही तत्व 'सत' से किस प्रकार उत्पन्न हो सकता है ।  उ...

ईश्वर के गुण

 *ईश्वर के गुण* १) वह चेतन दिव्य शक्ति परमेश्वर एक ही है । अर्थात कोई दूसरा उसके तुल्य वा अधिक नहीं । २) वह द्रष्टा है, और सब जगत में परिपूर्ण होकर जड़ तथा चेतन दोनों प्रकार के जगत को देखता है, उसका कोई द्रष्टा (अध्यक्ष) नहीं और वह स्वयं किसी का दृश्य भी नहीं हो सकता है । ३) वह सर्वज्ञ है, अर्थात् सब कुछ जानता है, और उसका ज्ञान संसार की सब वस्तुओं से प्रकट होता है । ४) वह सर्वव्यापक है, अर्थात सूक्ष्म से सूक्ष्म और महान् पदार्थ के अन्दर और बाहर ओत-प्रोत है । वह इस ब्रह्माण्ड में पूर्ण (सर्वत्र व्याप्त) हो रहा है । वह सूक्ष्मतर से भी सूक्ष्मतम और महत्तर से भी महत्तम है । इससे कोई सूक्ष्म तथा बड़ी वस्तु न तो है, न होगी और न थी । ५) वह स्वयं स्थिर है । जैसे एक वृक्ष शाखा, पत्र तथा पुष्पादिकों को धारण करता है, उसी प्रकार परमेश्वर पृथ्वी, सूर्यादि समस्त जगत को धारण करता हुआ, उसमें व्यापक होकर ठहरा हुआ है । जैसे आकाश के बीच में सब पदार्थ रहते हैं, परन्तु आकाश सबसे अलग रहता है, अर्थात किसी से बंधता नहीं, इसी प्रकार परमेश्वर को भी जानना चाहिये । ६) वह सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान है, क्योंकि उ...

वैदिक विचार

 *वैदिक विचार*    *पूजा* किसी वस्तु का सम्मान कर, उससे यथायोग्य लाभ लेना, पूजा है । *ईश्वर पूजा* ईश्वर के उपदेशों का पालन कर ज्ञान व आनन्द लेना, ही ईश्वर की पूजा अथवा ईश्वरभक्ति करना कहलाता है । *ईश्वरभक्ति की विधि* ईश्वर के तुल्य अपने गुण, कर्म, स्वभाव को बनाना । *ईश्वरभक्ति के लाभ* आत्मबल की प्राप्ति, पूर्ण सुखशांति व ईश्वर की प्राप्ति । ईश्वर की मूर्ति पर *फल-फूल का चढ़ावा* नहीं, मूर्ति जड़ है । ईश्वर चेतन व निराकार है उस पर फल, फूल जलादि नहीं चढ़ा सकते हैं ।  *ईश्वर की मूर्ति में प्राणप्रतिष्ठा* यह प्राणप्रतिष्ठा नहीं, पाखंड प्रतिष्ठा है, क्योंकि प्राणप्रतिष्ठा के बाद भी मूर्ति जीवित और चेतन नहीं होती है ।  ईश्वर का सही स्वरूप जानने के लिए मूर्तिपूजा ठीक नहीं है | बच्चों को शुरु में २×८= १६ सिखाते हैं, अथवा २×८ = ८ । तब गणित के समान विद्या-विज्ञान के दाता ईश्वर के स्वरूप को ही ठीक न सीखना व सिखाना महापाप, महाअन्याय है । ईश्वर कण-कण में है । जड़ मूर्ति में ईश्वर के समान ज्ञान, बल व सर्वज्ञता आदि गुण नहीं है ।  *अवतार* कहते हैं, उतरने को । सर्वव्यापक होने...

यदि ऋषि दयानन्द न आते तो क्या होता आर्य समाज मंदिर गया जी

चित्र
 ओ३म् “यदि ऋषि दयानन्द न आते तो क्या होता?” ========= ऋषि दयानन्द का जन्म 12 फरवरी, 1825 को गुजरात राज्य के मोरवी जिले के टंकारा कस्बे में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री कर्षनजी तिवारी था। जब उनकी आयु का चौदहवां वर्ष चल रहा था तो उन्होंने अपने  शिवभक्त पिता के कहने पर शिवरात्रि का व्रत रखा था। शिवरात्रि को अपने कस्बे के बाहर कुबेरनाथ के मन्दिर में पिता व स्थानीय कुछ लोगों के साथ उन्होंने रात्रि जागरण करते हुए चूहों को मन्दिर के अन्दर बने हुए बिलों से निकलकर शिवलिंग पर भक्तों द्वारा चढ़ाये गये अन्नादि पदार्थों को खाते देखा था। इससे उनकी शिव की मूर्ति में श्रद्धा, विश्वास एवं आस्था समाप्त हो गई थी। उनमें सच्चे शिव को जानने व प्राप्त करने की इच्छा व संकल्प उत्पन्न हुआ था। उसके बाद उनकी बहिन व चाचाजी की मृत्यु होने पर उन्हें वैराग्य हो गया था। सच्चे शिव को जानने और जन्म व मृत्यु के बन्धन से मुक्त होने के लिए उन्होंने अपनी आयु के बाईसवें वर्ष में गृहत्याग कर दिया था। आरम्भ में वह गुजरात में अनेक स्थानों पर रहकर धार्मिक विद्वानों व योगियों के सम्पर्क में आये थे और उनसे अपने प्रश्नों क...

*क्या मृत्यु के पश्चात श्राद्ध करना ठीक है

 क्या मृत्यु के पश्चात श्राद्ध करना ठीक है ? *वेद में कहा गया है, "भस्मान्तम् शरीरम् ।"*  *और यह अन्तिम क्रिया है । इसके पश्चात कोई क्रिया शेष नहीं रहती है । हां, उन अस्थियों को हम निर्जन स्थान में भूमि मे दबा दें । हम बाद में भी शरीर के लिये कुछ काम परम्परा के नाम पर करते हैं । कोई तीसरे दिन करता है, कोई पांचवें, कोई सातवें, कोई नवें, कोई ग्यारहवें, कोई तेरहवीं और कोई बरसी करता है । वास्तव में जिसकी मृत्यु हो गई, अब उससे हमारा कोई सम्बन्ध नहीं रहा । क्योंकि सम्बन्ध तो शरीर से होते हैं । आत्मा का तो किसी से कोई सम्बन्ध नहीं होता है ।* *मृत्योपरान्त आत्मा नया शरीर धारण कर लेता है । अब हम किसी को भोजन खिलाकर स्वयं तृप्त हो जायें या अपनी आत्मा को प्रसन्न करें यह अलग बात है । किसी दूसरे को खिलाकर तीसरे की तृप्ति होगी यह विचार ही मिथ्या है । क्योंकि भोजन का सम्बन्ध शरीर से है, आत्मा से नहीं । यह भोजन आत्मा को मिलता ही नहीं । जब हम जीवित रहते हैं, तब भी शरीर के लिए खाते हैं, आत्मा के लिए नहीं ।*          *ये शरीर तो आत्मा का साधन है, रथ है, वाहन है और वह भो...

मानव जीवन का लक्ष्य

चित्र
  *मानव जीवन का लक्ष्य* संसार में तीन वस्तुएं होती है - साध्य, साधक और साधन । "साध्य'' का अर्थ है, जिसे हम सिद्ध करना चाहते हैं अथवा प्राप्त करना चाहते हैं । ''साधक'' उसे कहते हैं, जो साध्य को प्राप्त करना चाहता है ।  और ''साधन'' उसे कहते हैं, जिसकी सहायता से साधक अपने साध्य तक पहुंच पाता है । वैदिक परिभाषाओं के अनुसार,  ''ईश्वर'' अथवा मोक्ष प्राप्ति साध्य है ।  ''आत्मा'' साधक है ।  और धन, संपत्ति, भोजन, वस्त्र, मकान आदि मोक्ष प्राप्ति के साधन हैं । संसार में कुछ लोग ईश्वर या मोक्ष प्राप्ति के लिए ईमानदारी से पुरुषार्थ करते हैं । वे लोग सच्चे साधक हैं । वे धन, भोजन, वस्त्र, मकान आदि साधन सीमित मात्रा में संग्रहित करते हैं । इन साधनों की सहायता से वेदों एवं दर्शन शास्त्रों की विद्या अर्जित कर वे समाधि लगाते हैं । इनकी सहायता से वे अपने साध्य ईश्वर या मोक्ष तक पहुंच जाते हैं । वही लोग वास्तव में सही दिशा में चल रहे होते हैं । अधिकांश लोग तो साध्य को समझते ही नहीं । जीवन में मात्र भोग करना, धन कमाना, संपत्ति जमा ...

कब हमारा मन सन्ध्या और उपासना में लगने लगेगा

 *कब हमारा मन सन्ध्या और उपासना में लगने लगेगा ?* लोग पूछा करते हैं कि हमने मान तो लिया कि ईश्वर का अस्तित्व है, ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव अनन्त हैं, उसके नाम भी अनन्त हैं । परन्तु क्या बात है कि हमारा मन ईश्वर की पूजा में नहीं लगता है, पूजा के समय मन भागता क्यों है, मन को हम वश में कैसे करें ? मन अपने वश में नहीं रहता, यह शिकायत सबको है, सबकी परेशानी सच्ची है । आपकी भी यह कठिनाई है, और बड़े-बड़े संन्यासियों और योगियों की भी । हम संध्या करने बैठते हैं, और जबान से तो सन्ध्या के सारे मन्त्र पढ़ जाते हैं, मन्त्र तो पढ़े जाते हैं, परन्तु मन कहीं और विचर रहे होते हैं । ऐसा क्यों होता है ? इसके सोचने का हमें प्रयत्न करना चाहिये । सन्ध्या के समय आपका मन भागता है, यह बात तो सच्ची है, परन्तु जब आप शतरंज का खेल खेलते हैं, ताश खेलते हैं, तो मन क्यों नहीं भागता है ? क्रिकेट की कमेण्टरी सुनने के लिए भीड़ क्यों उतावली रहती है ? टेस्टमैच देखने में मन क्यों लगता है ? सिनेमा और सरकस के समय मन क्यों नहीं भागता है ? मैं जब बच्चा था, तब गणित में मन नहीं लगता था, पर जब लगने लगा, तो अंकगणित या रेखागणित म...

पुनर्जन्म सम्बन्धी कुछ प्रश्नोत्तर:

 पुनर्जन्म सम्बन्धी कुछ प्रश्नोत्तर: ... वेद वरदान आर्य..........................  (1) पुनर्जन्म किसको कहते हैं ? उत्तर :- जब जीवात्मा एक शरीर का त्याग करके किसी दूसरे शरीर में जाती है तो इस बार बार जन्म लेने की क्रिया को पुनर्जन्म कहते हैं । (2) प्रश्न :- पुनर्जन्म क्यों होता है ? उत्तर :- जब एक जन्म के अच्छे बुरे कर्मों के फल अधुरे रह‌ जाते हैं तो उनको भोगने के लिए दूसरे जन्म आवश्यक हैं । (3) प्रश्न :- अच्छे बुरे कर्मों का फल एक ही जन्म में क्यों नहीं मिल जाता ? एक में ही सब निपट जाये तो कितना अच्छा हो ? उत्तर :- नहीं जब एक जन्म में कर्मों का फल शेष रह जाए तो उसे भोगने के लिए दूसरे जन्म अपेक्षित होते हैं । (4) प्रश्न :- पुनर्जन्म को कैसे समझा जा सकता है ? उत्तर :- पुनर्जन्म को समझने के लिए जीवन और मृत्यु को समझना आवश्यक है । और जीवन मृत्यु को समझने के लिए शरीर को समझना आवश्यक है । (5) प्रश्न :- शरीर के बारे में समझाएँ ? उत्तर :- हमारे शरीर को निर्माण प्रकृति से हुआ है ।जिसमें मूल प्रकृति (सत्व, रजस और तमस) से प्रथम बुद्धि तत्व का निर्माण हुआ है। बुद्धि से अहंकार (बुद्धि का आ...

किसी एक ही कर्मकी दक्षिणा देनेमें— दाताके वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) भेदसे दक्षिणामें शास्त्रानुसार अंतर होता है।

 किसी एक ही कर्मकी दक्षिणा देनेमें— दाताके वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) भेदसे दक्षिणामें शास्त्रानुसार अंतर होता है। *#ब्राह्मण_यजमानको—* शास्त्रोक्त नियत दक्षिणा ही देनी चाहिए। *#क्षत्रिय_यजमानको—*  दुगुनी दक्षिणा देनी चाहिए। *#वैश्य_यजमान—*  तिनगुनी दक्षिणा देवे,और  *#शूद्र_यजमान—* (जिनके यहां कुछ शास्त्रीय कर्म करनेका अधिकार है ऐसे सत्शूद्रों) को चौगुनी दक्षिणा देनी चाहिए। *यथोक्तां दक्षिणां दद्याद् ब्राह्मण: क्षत्रियस्तथा।* *द्विगुणां वैश्यवर्यस्तु त्रिगुणां शूद्रसत्तम:।* *चतुर्गुणां प्रयच्छेत मन्त्रसिद्धिविधीच्छया।।*                             (#सिद्धान्तसारसंग्रहे) इस श्लोकमें कही गई दक्षिणा साधारण यजमानोंके लिए है। यदि यजमान धनाढ्य या निर्धन है तो उनकी व्यवस्था इस प्रकार है— *धनिको द्विगुणं दद्यात् त्रिगुणन्तु महाधन:।* *यवार्द्धं तु दरिद्रेण दातव्यं पुण्यलब्घये।।* *दद्यान्महादरिद्रस्तु तदर्द्ध शुल्कमेव तु।।*                   ...