वेदों में, ईश्वर को *दयालु एवं न्यायकारी* कहा गया है ।

 वेदों में, ईश्वर को *दयालु एवं न्यायकारी* कहा गया है । ईश्वर दयालु इसलिए है कि वे प्रत्येक उस व्यक्ति को उसके द्वारा किये गये पाप कर्म का दण्ड अवश्य देते हैं, जिससे वह व्यक्ति आगे उस पाप कर्म को न करे ।  इसे दयालुता ही तो कहेगें, नहीं तो पापी व्यक्ति को दण्ड ना मिले तो दिन-प्रतिदिन बड़े से बड़ा पाप करने में वह सलंग्न रहेगा, जिससे की सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था नष्ट हो जायेगी ।  और न्यायकारी इसलिए कहा गया है कि किसी को भी उतना ही दण्ड मिलता है, जितने उसने पाप किया है | आज कुछ अज्ञानियों ने ईश्वर की न्याय व्यवस्था को न समझ कर शनि की मूर्ति पर तेल चढ़ाने से पापों का क्षमा होना प्रचारित कर दिया है । यह ना केवल ईश्वर की कर्म फल व्यवस्था का अपमान है, अपितु अपने आपको भी मुर्खता के घोर अंधकार में रखने के समान है । तेल चढ़ाने से ना तो कोई पाप कर्म क्षमा होता है, और ना ही अपने द्वारा किये गये पापों के कारण मिलने वाले दण्ड से मनुष्य बच पाता है । आप अपनी तर्कशील बुद्धि का प्रयोग कर स्वयं निर्णय करें कि वे सत्य का वरण करना चाहेगें, अथवा असत्य का वरण करना चाहेगें । और यही सत्यार्थ प्रकाश का...

वैदिक विचार

 *वैदिक विचार*   

*पूजा* किसी वस्तु का सम्मान कर, उससे यथायोग्य लाभ लेना, पूजा है ।

*ईश्वर पूजा* ईश्वर के उपदेशों का पालन कर ज्ञान व आनन्द लेना, ही ईश्वर की पूजा अथवा ईश्वरभक्ति करना कहलाता है ।

*ईश्वरभक्ति की विधि*

ईश्वर के तुल्य अपने गुण, कर्म, स्वभाव को बनाना ।

*ईश्वरभक्ति के लाभ*

आत्मबल की प्राप्ति, पूर्ण सुखशांति व ईश्वर की प्राप्ति ।

ईश्वर की मूर्ति पर *फल-फूल का चढ़ावा* नहीं, मूर्ति जड़ है । ईश्वर चेतन व निराकार है उस पर फल, फूल जलादि नहीं चढ़ा सकते हैं । 

*ईश्वर की मूर्ति में प्राणप्रतिष्ठा* यह प्राणप्रतिष्ठा नहीं, पाखंड प्रतिष्ठा है, क्योंकि प्राणप्रतिष्ठा के बाद भी मूर्ति जीवित और चेतन नहीं होती है ।

 ईश्वर का सही स्वरूप जानने के लिए मूर्तिपूजा ठीक नहीं है | बच्चों को शुरु में २×८= १६ सिखाते हैं, अथवा २×८ = ८ । तब गणित के समान विद्या-विज्ञान के दाता ईश्वर के स्वरूप को ही ठीक न सीखना व सिखाना महापाप, महाअन्याय है ।

ईश्वर कण-कण में है ।

जड़ मूर्ति में ईश्वर के समान ज्ञान, बल व सर्वज्ञता आदि गुण नहीं है । 

*अवतार* कहते हैं, उतरने को । सर्वव्यापक होने से ईश्वर का कहीं आना-जाना असंभव है ।

बिना जन्म लिये, ईश्वर पापियों के शरीर बना देता है, वैसे ही नष्ट भी कर सकता है । इसके लिए अवतार की आवश्यकता नहीं होती |

अनन्त ईश्वर का तिलभर के संसार या स्थान विशेष में रहना संभव नहीं है ।

ईश्वर भक्तों के दुःख दूर अपने भक्तों को ज्ञान, बल व सामर्थ्य देकर करता है |

*जन्म लेने से ईश्वर* : - सर्वज्ञ से अल्पज्ञ, सर्वत्र से एकत्र, स्वतंत्र से परतंत्र, निराकार से साकार, निर्विकार से विकारी और पवित्र से अपवित्र हो जायेगा ।

 इतने विशाल ब्रह्मांड,सूर्य, चंद्रमा, पहाड़ व शरीर की रचना को देखकर जिसे ईश्वर का ध्यान नहीं होता, उसका मानवकृत मूर्ति में भी ईश्वर का ध्यान नहीं लगेगा ।

ईश्वर के ज्ञान, बल व आनन्दादि की अनुभूति होने को ही दर्शन या साक्षात्कार कहते हैं ।

ईश्वर का उपासक, वेदों का विद्वान, धर्मात्मा, मुमुक्षु, योगी, संन्यासी ईश्वर का *साक्षात्कार* कर सकता है |

*आस्तिक*

१. सच्चा आस्तिक सदैव निर्भय , प्रसन्न रहता है । 

२. भौतिक सुखों में आकर्षित नहीं होता है ।

३. सब प्राणियों से आत्मवत् व्यवहार करता है । 

४. वेदानुसार निष्काम कर्म करता है ।

आज बहुसंख्यक लोग मूर्ति पूजा करते हैं, और इस आधार पर मूर्ति पूजा का समर्थन नहीं किया जा सकता है | सत्य का निर्णय तर्क व प्रमाणों से होता है, बहुमत से नहीं, जैसे - एक सूर्य तमनाशक है, अनंततारे नहीं ।

किसी पदार्थ का सत्यस्वरूप जिस साधन से जाना जाये या निश्चय किया जाये, वह *प्रमाण* है ।

किसी कारण को देखकर किसी विषय में विचार करना, कि यह वस्तु ऐसी होनी चाहिये यह *तर्क* है ।

जिसमें रूप-रंग व आकार हो, उसे *मूर्ति* कहते हैं ।

*जड़ मूर्ति व चेतन मूर्ति*

पृथ्वी, सूर्य, पहाड़, कार, मोबाईल आदि जड़ होते हैं ।

माता-पिता, शिक्षक, अतिथि आदि देवता चेतन होते हैं ।

 माता-पिता, आचार्य, विद्वानादि पालनकर्ता लोगों से विद्या, सुशिक्षा लेना, उनकी आज्ञा का पालन करना, उनके प्रति निंदा, हिंसा, कटुवचन न बोलना, तन, मन व धन से उनकी सेवा, रक्षा करना *'चेतन मूर्तिपूजा'* कहलाती है ।

*ईश्वर की मूर्ति नहीं होती है, वेदों में प्रमाण*

"न तस्य प्रतिमाऽस्ति |'' 

     (यजुर्वेद ३२.३) 

     ईश्वर की प्रतिमा, मूर्ति नहीं होती है । 

*सर्वव्यापक, निराकार, ईश्वर की मूर्तिपूजा* अपनी अज्ञानता, अविद्या, हठ, दुराग्रह, स्वार्थ, भय और गलत सीखने-सिखाने से होता है । 

श्रीराम ने *रामेश्वरम् में महादेव की मूर्ति स्थापित* कर पूजा नहीं की थी | देखो - 

'अत्र पूर्व महादेवः प्रसादमकरोत् विभुः |' 

      हे सीते ! यह वह स्थान है, जहां पर विभु अर्थात् सर्वव्यापक महादेव ईश्वर ने हम पर कृपा की थी । अत: 'विभु' होने से महादेव की मर्ति पूजा स्वयं असिद्ध हो गई ।

*प्रार्थना व समर्पण से ईश्वर हमारे पाप क्षमा* नहीं करता है |प्रार्थना से दयालु प्रभु हमें पाप से बचने व दु:ख सहने की महानशक्ति देता है ।

*ईश्वर दयालु है, परन्तु हमारे पाप को क्षमा* नहीं करता है, क्योंकि -

# क्षमा करने से सुधार कभी नहीं होता ।

# वह दयालु है, हमें पापों से बचाना चाहता है। 

# ईश्वर न्यायकारी है, जैसा कर्म वैसा फल । 

# कर्मफल न देने से ईश्वर अन्यायकारी होता है |

*कोई धर्मगुरु आदि हमारे पाप कर्मों* को अपने उपर नहीं ले सकता है | अपने किये कर्मों का फल कितने भी जन्म लेकर भी स्वयं ही भोगना पड़ता है ।

*महापुरुष दुष्टों के पाप कर्मों को क्षमा* नहीं करते हैं, अपितु महापुरुष दुष्टों के अन्याय को सह लेते हैं, द्वेष नहीं करते, यही क्षमा का अर्थ है ।

*तीर्थ, मन्दिर, पीर, दरगाह जाने से* पाप नहीं छूटते, पापों का नाश तो ईश्वरभक्ति, योगाभ्यास, सत्यभाषण और परोपकारादि से होता है ।

*प्रायश्चित* :- पाप कर्मों के प्रति घृणा-ग्लानि व कष्ट भोगने के भाव को प्रायश्चित कहते हैं ।

*प्रार्थना से पाप क्षमा - एक भ्रम* :- यह स्वार्थी पंडे-पुजारी, कथावाचक, झूठे धर्मगुरु, ज्योतिषी व अज्ञान-अविद्या है ।

*सभी शंकाओं का समाधान व विद्याओं का मूल* :-  ईश्वर व उसकी दी गई वेद विद्या ।

*पूजाघरों में रखी मूर्तियां ईश्वर की नहीं, तो किसकी* :- कुछ तो पूर्वज महापुरुषों की हैं और कुछ काल्पनिक और निराधार हैं ।

*धार्मिक, सत्यवादी, देशभक्तों, महापुरुषों के चित्र या मूर्ति का घर में रखना* :- हाँ, उनके जीवन से शिक्षा ग्रहण करें और अपने जीवन को भी महान बनाये, परन्तु अप्रामाणिक, विज्ञान विरुद्ध चित्र न रखें । प्रामाणिक चित्र रखें व उनकी सुरक्षा भी करें ।

*परमेश्वर की भक्ति न करने से हानि* :-  ईश्वर भक्तिहीन कभी भी पाप कर्मों से छुटकर सुख - शांति प्राप्त नहीं कर सकता है ।

*परमपूज्य और धारण करने योग्य देवता* :- 'परमपिता परमेश्वर' ।

*मनुष्य के जीवन का मुख्य उद्देश्य* :- परमेश्वर की प्राप्ति, मोक्ष की प्राप्ति |

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