धन तेरा हुआ बर्बाद,अरे नादान क्यों पीता है।

 *धुन : हम भूल गये रे हर बात...* *धन तेरा हुआ बर्बाद,अरे नादान क्यों पीता है।* *बुद्धि का बिगड़ा साज,अरे नादान क्यों पीता है।।टेक।।* *तुझ से पहले भी अनेकों ही,इस मय सागर में डूब गये।*  *कितनों ने जीवन खो ही दिया,कितने फांसी पर झूल गये।।*  *तेरा तन था कभी फौलाद,अरे नादान क्यों पीता है।।१।।*  *हैं मात पिता बूढ़े तेरे,कभी उनकी तरफ देखा ही नहीं।*  *अन्दर ही अन्दर रोते हैं,सुख-दुख की कभी पूछा ही नहीं।।* *कर माॅं के दूध को याद,अरे नादान को पीता है।।२।।*  *बेटी तेरी ये कहती है,मैंने जनम लिया क्यों इस घर में।*  *हे परमपिता क्यों भूल गये,क्यों भेज दिया है इस घर में।।*  *सुन बेटी की फरियाद,अरे नादान क्यों पीता है।।३।।*  *कोई पी न सका इस बोतल को,पर ये सब को पी जाती है।* *जब बोतल ने पी तुझको लिया,तब याद प्रभु की आती है।।*  *'मूलचन्द' तू कर धन्यवाद,अरे नादान क्यों पीता है।।४।।*

ईश्वर विषय

 *ईश्वर विषय*

# ईश्वर का मुख्य नाम

        ‘ओ३म्’ है ।

# ईश्वर के असंख्य गौणिक नाम हैं । जिससे हमें उसके गुण, कर्म और स्वभाव का पता चलता है ।

# ईश्वर एक ही है, उसके नाम अनेक हैं ।

# ईश्वर कभी जन्म नहीं लेता ।

         वह अजन्मा है ।

# स्तुति, प्रार्थना, उपासना मात्र ईश्वर की ही करनी चाहिये । 

# ईश्वर से अधिक सामर्थ्यशाली और कोई नहीं है । 

        वह सर्वशक्तिमान है ।

# जिसमें सबसे अधिक ऐश्वर्य होता है, उसे इन्द्र कहते हैं, अर्थात ‘इन्द्र’ ईश्वर का नाम है ।

# दुःख तीन प्रकार के होते हैं - 

आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक दुःख ।

# अविद्या, राग-द्वेष, रोग इत्यादि से होने वाले दुःख को,

 आध्यात्मिक दुःख कहते हैं । 

# मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट-पतंग, मक्खी-मच्छर, सांप इत्यादि से होने वाले दुःख को,

 आधिभौतिक दुःख कहते हैं ।

# अधिक सर्दी, गर्मी, वर्षा, भूख, प्यास, मन की अशान्ति से होने वाले दुःख को,

 आधिदैविक दुःख कहते हैं ।

# विष्णु, वरुण, परमात्मा, पिता, ब्रह्मा, महादेव, महेश, सरस्वती, शिव, गणेश आदि नाम ईश्वर के गुणवाचक हैं, इन नामों के चित्र नहीं बन सकते हैं । 

# ईश्वर के तीन गुण - 

न्याय, दया और ज्ञान ।

# ईश्वर के तीन कर्म -

१) ईश्वर संसार को बनाता है ।

२) ईश्वर वेदों का उपदेश करता है‌ ।

३) ईश्वर कर्मों का फल देता है |

# जिसका कभी अन्त नहीं होता उसे अनन्त कहते हैं । 

       ईश्वर अनन्त है ।

# ‘गणेश’ ईश्वर का नाम इसलिए है, क्योंकि वह पूरे संसार का स्वामी है और सबका पालन करता है ।

# ‘सरस्वती’ ईश्वर का एक नाम है । संसार का पूर्ण ज्ञान जिसे होता है, उसे सरस्वती कहते हैं ।

# ईश्वर का कोई आकार, रुप, रंग, मूर्ति नहीं है । अतः उसे निराकार कहते हैं ।

# राहु और केतु नाम के कोई ग्रह नहीं होते हैं । ये दोनों नाम ईश्वर के हैं ।

# ईश्वर जगत को बनाता है, इसलिए उसे ब्रह्मा कहते हैं ।

# शुद्ध - राग-द्वेष, छल-कपट, झूठ इत्यादि समस्त बुराइयों से वह दूर है । उसका स्वभाव पवित्र है ।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आर्य समाज में अंतिम संस्कार की प्रक्रिया बहुत ही सरल और वैदिक परंपराओं के अनुसार होती है।

शुभ विवाह की वर्षगांठ पर, सौ-सौ बार बधाई हो।

वैदिक संस्कृति बनाम बाज़ार संस्कृति

प्रभु जी इतनी सी दया कर दो, हमको भी तुम्हारा प्यार मिले

धर्म किसे कहते है ? क्या हिन्दू, इस्लाम, आदि धर्म है?