वेदों में, ईश्वर को *दयालु एवं न्यायकारी* कहा गया है ।

 वेदों में, ईश्वर को *दयालु एवं न्यायकारी* कहा गया है । ईश्वर दयालु इसलिए है कि वे प्रत्येक उस व्यक्ति को उसके द्वारा किये गये पाप कर्म का दण्ड अवश्य देते हैं, जिससे वह व्यक्ति आगे उस पाप कर्म को न करे ।  इसे दयालुता ही तो कहेगें, नहीं तो पापी व्यक्ति को दण्ड ना मिले तो दिन-प्रतिदिन बड़े से बड़ा पाप करने में वह सलंग्न रहेगा, जिससे की सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था नष्ट हो जायेगी ।  और न्यायकारी इसलिए कहा गया है कि किसी को भी उतना ही दण्ड मिलता है, जितने उसने पाप किया है | आज कुछ अज्ञानियों ने ईश्वर की न्याय व्यवस्था को न समझ कर शनि की मूर्ति पर तेल चढ़ाने से पापों का क्षमा होना प्रचारित कर दिया है । यह ना केवल ईश्वर की कर्म फल व्यवस्था का अपमान है, अपितु अपने आपको भी मुर्खता के घोर अंधकार में रखने के समान है । तेल चढ़ाने से ना तो कोई पाप कर्म क्षमा होता है, और ना ही अपने द्वारा किये गये पापों के कारण मिलने वाले दण्ड से मनुष्य बच पाता है । आप अपनी तर्कशील बुद्धि का प्रयोग कर स्वयं निर्णय करें कि वे सत्य का वरण करना चाहेगें, अथवा असत्य का वरण करना चाहेगें । और यही सत्यार्थ प्रकाश का...

ईश्वर विषय

 *ईश्वर विषय*

# ईश्वर का मुख्य नाम

        ‘ओ३म्’ है ।

# ईश्वर के असंख्य गौणिक नाम हैं । जिससे हमें उसके गुण, कर्म और स्वभाव का पता चलता है ।

# ईश्वर एक ही है, उसके नाम अनेक हैं ।

# ईश्वर कभी जन्म नहीं लेता ।

         वह अजन्मा है ।

# स्तुति, प्रार्थना, उपासना मात्र ईश्वर की ही करनी चाहिये । 

# ईश्वर से अधिक सामर्थ्यशाली और कोई नहीं है । 

        वह सर्वशक्तिमान है ।

# जिसमें सबसे अधिक ऐश्वर्य होता है, उसे इन्द्र कहते हैं, अर्थात ‘इन्द्र’ ईश्वर का नाम है ।

# दुःख तीन प्रकार के होते हैं - 

आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक दुःख ।

# अविद्या, राग-द्वेष, रोग इत्यादि से होने वाले दुःख को,

 आध्यात्मिक दुःख कहते हैं । 

# मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट-पतंग, मक्खी-मच्छर, सांप इत्यादि से होने वाले दुःख को,

 आधिभौतिक दुःख कहते हैं ।

# अधिक सर्दी, गर्मी, वर्षा, भूख, प्यास, मन की अशान्ति से होने वाले दुःख को,

 आधिदैविक दुःख कहते हैं ।

# विष्णु, वरुण, परमात्मा, पिता, ब्रह्मा, महादेव, महेश, सरस्वती, शिव, गणेश आदि नाम ईश्वर के गुणवाचक हैं, इन नामों के चित्र नहीं बन सकते हैं । 

# ईश्वर के तीन गुण - 

न्याय, दया और ज्ञान ।

# ईश्वर के तीन कर्म -

१) ईश्वर संसार को बनाता है ।

२) ईश्वर वेदों का उपदेश करता है‌ ।

३) ईश्वर कर्मों का फल देता है |

# जिसका कभी अन्त नहीं होता उसे अनन्त कहते हैं । 

       ईश्वर अनन्त है ।

# ‘गणेश’ ईश्वर का नाम इसलिए है, क्योंकि वह पूरे संसार का स्वामी है और सबका पालन करता है ।

# ‘सरस्वती’ ईश्वर का एक नाम है । संसार का पूर्ण ज्ञान जिसे होता है, उसे सरस्वती कहते हैं ।

# ईश्वर का कोई आकार, रुप, रंग, मूर्ति नहीं है । अतः उसे निराकार कहते हैं ।

# राहु और केतु नाम के कोई ग्रह नहीं होते हैं । ये दोनों नाम ईश्वर के हैं ।

# ईश्वर जगत को बनाता है, इसलिए उसे ब्रह्मा कहते हैं ।

# शुद्ध - राग-द्वेष, छल-कपट, झूठ इत्यादि समस्त बुराइयों से वह दूर है । उसका स्वभाव पवित्र है ।

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