धन तेरा हुआ बर्बाद,अरे नादान क्यों पीता है।

 *धुन : हम भूल गये रे हर बात...* *धन तेरा हुआ बर्बाद,अरे नादान क्यों पीता है।* *बुद्धि का बिगड़ा साज,अरे नादान क्यों पीता है।।टेक।।* *तुझ से पहले भी अनेकों ही,इस मय सागर में डूब गये।*  *कितनों ने जीवन खो ही दिया,कितने फांसी पर झूल गये।।*  *तेरा तन था कभी फौलाद,अरे नादान क्यों पीता है।।१।।*  *हैं मात पिता बूढ़े तेरे,कभी उनकी तरफ देखा ही नहीं।*  *अन्दर ही अन्दर रोते हैं,सुख-दुख की कभी पूछा ही नहीं।।* *कर माॅं के दूध को याद,अरे नादान को पीता है।।२।।*  *बेटी तेरी ये कहती है,मैंने जनम लिया क्यों इस घर में।*  *हे परमपिता क्यों भूल गये,क्यों भेज दिया है इस घर में।।*  *सुन बेटी की फरियाद,अरे नादान क्यों पीता है।।३।।*  *कोई पी न सका इस बोतल को,पर ये सब को पी जाती है।* *जब बोतल ने पी तुझको लिया,तब याद प्रभु की आती है।।*  *'मूलचन्द' तू कर धन्यवाद,अरे नादान क्यों पीता है।।४।।*

जाने भारतीय संस्कृति का प्रतीक -वैदिक धर्म का आधार यज्ञोपवीत/ जनेऊ सभी स्त्री पुरूष -युवक युवतियाँ क्यों धारण करें ?

 जाने भारतीय संस्कृति का प्रतीक -वैदिक धर्म का आधार यज्ञोपवीत/ जनेऊ सभी स्त्री पुरूष -युवक युवतियाँ क्यों धारण करें ?


यज्ञोपवीत भारतीय संस्कृति का प्रतीक है। यह यज्ञ की वेश-भूषा है। यह विद्या का चिह्न है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, हनुमान जी,योगिराज श्रीकृष्ण, महाराज शिव, ब्रह्मा जी, ब्रह्मवादिनी गार्गी, भगवती सीता सती-साध्वी द्रौपदी आदि सभी नर-नारी यज्ञोपवीत धारण करते थे। यज्ञोपवीत में तीन तार-धागे होते हैं। तीनों तारों का सन्देश है-

मनुष्य पर तीन ऋण चढ़े हुए हैं- देवऋण, ऋषि-ऋण, पितृ-ऋण। इन तीनों ऋणों से उऋण होना होता है। 

देव ऋण :- यज्ञ करो, परमेश्वर की उपासना करो। 

ऋषि ऋण :- विद्वानों का सत्कार करो, वेद का स्वाध्याय करो,

 पितृ-ऋण:- माता-पिता की सेवा करो अचार्य गुरू का सत्कार करो  इस प्रकार इन ऋणों से उऋण होंगे।

तीन अनादि पदार्थ हैं- ईश्वर, जीव, प्रकृति। इन तीनों को जानें। 

ईश्वर का और हमारा क्या सम्बन्ध है? उसे कैसे पाया जा सकता है। मैं कौन हूँ? कहॉं से आया हूँ? मुझे कहॉं जाना है? इन बातों का चिन्तन करें। संसार क्या है? हम इस गोरखधन्धे में कैसे फंस गये? इससे कैसे निकल सकते हैं? इन तत्वों पर चिन्तन और विचार करना।


यज्ञोपवीत के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। इस प्रकार कुल तारों की संख्या नौ हो जाती है। नौ तार क्या सन्देश देते हैं? वेद में कहा है-


अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या।। अथर्ववेद 10.2.31

आठ चक्रों और नौ द्वारों वाला अयोध्या नामक एक नगर है। यह नगर है  मानव देह इसमें आठ चक्र हैं और नौ द्वार हैं। नौ द्वार हैं- दो आंख, दो कान, दो नासिका छिद्र, एक मुख ये सात हुए। इनके लिए वेद में कहा है कि हमारे शरीर में सात ऋषि बैठे हुए हैं। इन्हें ऋषि बनाना है। ये ऋषि बन गये तो जीवन का कल्याण हो जाएगा। यदि ये राक्षस बन गये तो जीवन का विनाश हो जाएगा। दो मल और मूत्र के द्वार हैं। इस प्रकार कुल नौ द्वार हैं। यज्ञोपवीत के नौ तार सन्देश देते हैं कि अपनी इन्द्रियों पर एक-एक चौकीदार बैठाओ, जिससे किसी इन्द्रिय से कोई बुराई जीवन में प्रवेश न करे। हम कानों से अच्छा सुनें, आँखों से अच्छा देखें। नासिका से ओ३म का जप करें। (जप नासिका से ही होता है) मुख से अभक्ष्य पदार्थों का सेवन न करें। मल-मूत्र के द्वारों से ब्रह्मचर्य का पालन करें।

यज्ञोपवीत में पांच गांठें होती हैं। पांच गांठों के दो सन्देश हैं-

काम, क्रोध, लोभ मोह और मद (अभिमान) ये मनुष्य के पॉंच शत्रु हैं। इन पर विजय प्राप्त करें। 

दूसरा गृहस्थों को प्रतिदिन पॉंच यज्ञों का अनुष्ठान करना चाहिए। पॉंच यज्ञ ये हैं-

1 ब्रह्मयज्ञ- सन्ध्या और स्वाध्याय।

2.  देवयज्ञ-अग्निहोत्र और विद्वानों का मान-सम्मान। 

3.पितृयज्ञ- जीवित माता-पिता, दादा-दादी, परदादा आदि का श्रद्धा से सेवा  और तर्पण करना, इनकी सेवा-शुश्रूषा करके इन्हें सदा प्रसन्न रखना और इनका आशीर्वाद प्राप्त करना।

4.   बलिवैश्वदेवयज्ञ- घर में जो भोजन बने उसमें से खट्टे और नमकीन पदार्थों को छोड़कर रसोई की अग्नि में दस आहूतियॉं देना तथा कौआ, कुत्ता, कीट-पतंग, लूले-लंगड़े, पापरोगी, चाण्डाल को भी अपने भोजन में से भाग देना। 

5. अतिथियज्ञ-घर पर आने वाले वेद-शास्त्रों के विद्वान, धार्मिक उपदेशकों का भी आदर-सम्मान करना।

इसे बायें कन्धें पर डाला जाता है। यह हृदय से होता हुआ कटिबंध तक पहुंचता है। मनुष्य जन्म से शूद्र होता है यज्ञोपवीत संस्कार होने पर द्विज अर्थात ब्रह्मण क्षत्रीय वेशय बनता है। द्विज बनने पर कर्त्तव्यों का भार वहन करना होता है। मनुष्य में बोझ उठाने की शक्ति कन्धे में होती है, इसलिए इसे कन्धे पर डाला जाता है। यज्ञोपवीत धारण करते हुए कुछ प्रतिज्ञाएं की जाती हैं। इन प्रतिज्ञाओं का हृदय से पालन करना होता है। इसलिए यह हृदय से होता हुआ आता है। अपने कर्त्तव्यों को करने के लिए हम सदा कटिबद्ध रहेंगे, इसलिए यह कटिबंध तक पहुंचता है।

संक्षेप में यज्ञोपवीत का यह सन्देश है।

इसे धारण करके उतारे नहीं, घर जाकर खूंटी पर न टांगें । सोपवीती सदा भाव्यम्। सदा यज्ञोपवीतधारी रहना चाहिए। 


यज्ञोपवीत पुरूष व स्त्री दोनों को धारण करने का वैदिक आदेश है ।

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