वेदों में, ईश्वर को *दयालु एवं न्यायकारी* कहा गया है ।
वेदों में,
ईश्वर को *दयालु एवं न्यायकारी* कहा गया है ।
ईश्वर दयालु इसलिए है कि वे प्रत्येक उस व्यक्ति को उसके द्वारा किये गये पाप कर्म का दण्ड अवश्य देते हैं, जिससे वह व्यक्ति आगे उस पाप कर्म को न करे ।
इसे दयालुता ही तो कहेगें, नहीं तो पापी व्यक्ति को दण्ड ना मिले तो दिन-प्रतिदिन बड़े से बड़ा पाप करने में वह सलंग्न रहेगा, जिससे की सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था नष्ट हो जायेगी ।
और न्यायकारी इसलिए कहा गया है कि किसी को भी उतना ही दण्ड मिलता है, जितने उसने पाप किया है |
आज कुछ अज्ञानियों ने ईश्वर की न्याय व्यवस्था को न समझ कर शनि की मूर्ति पर तेल चढ़ाने से पापों का क्षमा होना प्रचारित कर दिया है ।
यह ना केवल ईश्वर की कर्म फल व्यवस्था का अपमान है, अपितु अपने आपको भी मुर्खता के घोर अंधकार में रखने के समान है ।
तेल चढ़ाने से ना तो कोई पाप कर्म क्षमा होता है, और ना ही अपने द्वारा किये गये पापों के कारण मिलने वाले दण्ड से मनुष्य बच पाता है ।
आप अपनी तर्कशील बुद्धि का प्रयोग कर स्वयं निर्णय करें कि वे सत्य का वरण करना चाहेगें, अथवा असत्य का वरण करना चाहेगें ।
और यही सत्यार्थ प्रकाश का मूल उद्देश्य है |
*ईश्वर दयालु और न्यायप्रिय है |*
ईश्वर को दयालु और न्यायप्रिय दोनों ही कहा गया है । ईश्वर निष्काम भाव से जीवात्माओं के कर्म और भोग के निमित सृष्टि का निर्माण करते हैं । जिससे कि मनुष्य रूपी आत्मा उत्तम कर्म कर मुक्ति को प्राप्त कर सके । ईश्वर जीवात्माओं के शुभ-अशुभ कर्मों के अनुसार बिना पक्षपात के सुख-दुःख रूपी फल देते हैं । यही उनकी न्याय प्रियता है ।
कुछ लोग यह शंका करते हैं कि
यदि ईश्वर पुण्य के समान पापों का भी फल उसी अनुपात में देता है । तो फिर वह दयालु कैसे ? क्योंकि अपराधी को क्षमा करना दया है । जब ईश्वर पापों को क्षमा ही नहीं करता है तो फिर दयालु कैसे सिद्ध हुआ ?
यदि ईश्वर न्यायकारी है ? उसी अनुपात में दण्ड देता है । तो फिर वह दयालु हो ही नहीं सकता । दयालु और न्यायप्रियता दोनों विपरीत गुण है । ये दोनों गुण एक साथ ईश्वर के कैसे हो सकते हैं ?
इस शंका का मूल कारण दयालु का यथार्थ अर्थ को नहीं समझना है । एक अपराधी को क्षमा करके छोड़ देना, दया नहीं । उसके और सब जगत के साथ अन्याय करना है । पापी को पाप का दण्ड अवश्य मिलना चाहिए । दण्ड का उद्देश्य अपराधी सुधार, दूसरों को उससे और उस जैसे लोगों से बचाना और धर्म नीति तथा राज नियम के महत्व को समाज में स्थापित करना है । दण्ड मिलने में ही पापी का भला है । उसे दण्ड न देना उसके दोषों को बढ़ाना और अत्याचार करना है ।
सत्य तो यह है कि परिणाम की दृष्टि से न्याय और दया का नाम मात्र भेद है । क्योंकि जो न्याय से प्रयोजन सिद्ध होता है, वही दया से । दण्ड देने का प्रयोजन है कि मनुष्य अपराध करने से स्वयं को रोककर दुखों को प्राप्त न हो । वही दया कहलाती है, जो पराये दुःखों का छुड़ाना है । इन दोनों का इतना ही भेद है कि जो मन में सब की सुख देने और दुःख छुड़ाने की इच्छा एवं कृपा करना है । वह दया और उपकार की दृष्टि से न्याय कहलाता है । दोनों का प्रयोजन जीवात्माओं को पाप और दुःखों से दूर कराना है ।
इसलिए तीर्थ यात्रा या गंगा स्नान से मुक्ति, पीर या कब्र पूजा से बरकत, गिरिजा घर में जाकर प्रार्थना से पाप क्षमा होना, मात्र इस्लाम और रसूल पर विश्वास से जन्नत का मिलना सब भ्रम है । मनुष्य जैसा कर्म करेगा उसे वैसा ही फल निश्चित रूप से मिलेगा ।
दण्ड को न्याय और उसके प्रयोजन को दया कहते हैं ।
*क्या ईश्वर पाप क्षमा करता है ?*
# "आत्मना विहितं दुःख आत्मना विहितं सुखम् |
गर्भशय्यामुपादाय भुज्यते पौर्वदेहिकम् ||"
अर्थात दुःख अपने ही किये हुए कर्मों का फल है और सुख भी अपने ही पूर्व कृत कर्मो का परिणाम है । जीव माता के गर्भ में आते ही पूर्व जन्म में किये गये कर्मों का फल भोगने लगता है |
# "यथा धेनु सहस्त्रेषु वत्सो विदन्ति मातरम् |
तथा पूर्वकृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति ||"
अर्थात जैसे बछड़ा हजारों गायों के बीच में अपनी माँ को पहचान कर उसे पा लेता है, ठीक इसी प्रकार किया हुआ कर्म भी अपने कर्ता के पास पहुँच जाता है |
# श्री रामचन्द्र जी कहते हैं कि हमने इच्छानुसार पूर्व जन्मों में बहुत सारे पाप कर्म किये हैं, आज उन्हीं का फल मिल रहा है । इसी कारण हमारे ऊपर दुःख पड़ रहे हैं । राज्य का नाश होना, पिताजी का मरना, माता जी का व समस्त परिवार का छूटना यह सब बातें जब स्मरण आती है, तो मुझे दुःख के सागर में डुबो देती है |
# "अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् |
नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि ||"
अर्थात अच्छा या बुरा कर्मफल अवश्य ही भोगना पड़ता है, चाहे जितना भी समय हो जाए बिना भोगे कर्म की समाप्ति नहीं होती ।
कितना भी जप, तप, तीर्थ, धूप, अगरबती, व्रत, उपवास आदि कर लो, पाप कर्मों का फल भुगतना ही पड़ता है । शुभ, अशुभ मिश्रित व निष्काम कर्मों का अपना अपना फल है ।
यज्ञ योग जैसे निष्काम कर्म ही बन्धनों से छुड़ा कर मोक्ष दिलाने वाले हैं ।
शुभ कर्म व निष्काम कर्म - यज्ञ, योग, वेद पढ़ना और वेद पढ़ाना स्वर्ग और मोक्ष पाना और पापों से बचना, तो यही एक मात्र उपाय है ।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें