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ईश्वर का शुक्रिया :- करने के लिए निम्नलिखित कारण है :-

*ईश्वर का शुक्रिया :- करने के लिए निम्नलिखित कारण है :-* 1. *टायर चलने पर घिसते हैं, लेकिन पैर के तलवे जीवनभर दौड़ने के बाद भी नए जैसे रहते हैं।*   2. *शरीर 75% पानी से बना है, फिर भी लाखों रोमकूपों के बावजूद एक बूंद भी लीक नहीं होती।*   3. *कोई भी वस्तु बिना सहारे नहीं खड़ी रह सकती, लेकिन यह शरीर खुद को संतुलित रखता है।*   4. *कोई बैटरी बिना चार्जिंग के नहीं चलती, लेकिन हृदय जन्म से लेकर मृत्यु तक बिना रुके धड़कता है।* 5. *कोई पंप हमेशा नहीं चल सकता, लेकिन रक्त पूरे जीवनभर बिना रुके शरीर में बहता रहता है।*   6. *दुनिया के सबसे महंगे कैमरे भी सीमित हैं, लेकिन आंखें हजारों मेगापिक्सल की गुणवत्ता में हर दृश्य कैद कर सकती हैं।*   7. *कोई लैब हर स्वाद टेस्ट नहीं कर सकती, लेकिन जीभ बिना किसी उपकरण के हजारों स्वाद पहचान सकती है।*   8. *सबसे एडवांस्ड सेंसर भी सीमित होते हैं, लेकिन त्वचा हर हल्की-से-हल्की संवेदना को महसूस कर सकती है।*   9. *कोई भी यंत्र हर ध्वनि नहीं निकाल सकता, लेकिन कंठ से हजारों फ्रीक्वेंसी की आवाजें पैदा ...

जाने भारतीय संस्कृति का प्रतीक -वैदिक धर्म का आधार यज्ञोपवीत/ जनेऊ सभी स्त्री पुरूष -युवक युवतियाँ क्यों धारण करें ?

 जाने भारतीय संस्कृति का प्रतीक -वैदिक धर्म का आधार यज्ञोपवीत/ जनेऊ सभी स्त्री पुरूष -युवक युवतियाँ क्यों धारण करें ? यज्ञोपवीत भारतीय संस्कृति का प्रतीक है। यह यज्ञ की वेश-भूषा है। यह विद्या का चिह्न है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, हनुमान जी,योगिराज श्रीकृष्ण, महाराज शिव, ब्रह्मा जी, ब्रह्मवादिनी गार्गी, भगवती सीता सती-साध्वी द्रौपदी आदि सभी नर-नारी यज्ञोपवीत धारण करते थे। यज्ञोपवीत में तीन तार-धागे होते हैं। तीनों तारों का सन्देश है- मनुष्य पर तीन ऋण चढ़े हुए हैं- देवऋण, ऋषि-ऋण, पितृ-ऋण। इन तीनों ऋणों से उऋण होना होता है।  देव ऋण :- यज्ञ करो, परमेश्वर की उपासना करो।  ऋषि ऋण :- विद्वानों का सत्कार करो, वेद का स्वाध्याय करो,  पितृ-ऋण:- माता-पिता की सेवा करो अचार्य गुरू का सत्कार करो  इस प्रकार इन ऋणों से उऋण होंगे। तीन अनादि पदार्थ हैं- ईश्वर, जीव, प्रकृति। इन तीनों को जानें।  ईश्वर का और हमारा क्या सम्बन्ध है? उसे कैसे पाया जा सकता है। मैं कौन हूँ? कहॉं से आया हूँ? मुझे कहॉं जाना है? इन बातों का चिन्तन करें। संसार क्या है? हम इस गोरखधन्धे में कैसे फंस गये? ...

अंधविश्वास : किसी भी जीव की हत्या करना पाप है, किन्तु मक्खी, मच्छर, कीड़े मकोड़े को मारने में कोई पाप नही होता ।

अंधविश्वास  :  किसी भी जीव की हत्या करना पाप है, किन्तु मक्खी, मच्छर, कीड़े मकोड़े को मारने में कोई पाप नही होता ।     निर्मुलन  :  हत्या करना पाप है  -- बिलकुल ठीक है, किन्तु जो दुष्कर्म करता है,और जो मनुष्य  - जाति के लिए हानिकारक है उसे सरकार भी फाँसी की सज़ा सुनाती है। उचित तो यह है कि मक्खी  - मच्छरों को घर में आने से रोकने के उपाय करने चाहिए, मक्खी  - मच्छरों को घर में आने से रोका जा सकता है, अगर फिर भी जो मच्छर, जीव-जन्तु हानि पहुचाते है उनको मारना ही उचित है। क्योंकि सब योनियो में मनुष्य योनि सर्वश्रेष्ठ है, इसकी रक्षा करना मनुष्य का परम कर्तव्य है।जिससे भी मनुष्य को अपने प्राणों का खतरा है उसको मार डालने में कोई आपत्ति नहीं है। अगर कोई मनुष्य भी मनुष्य जाति के लिए खतरा बन जाता है तो, उसे भी मार डालने में कोई पाप नही है ।       महाभारत में एक श्लोक के द्वारा समझाते हुए कहा गया है कि --       " अहिंसा परमो धर्म, धर्म हिंसा तदैव च। " अर्थात अहिंसा मनुष्य का परम धर्म है। किन्तु धर्म की रक्षा के लिए हिंस...

धर्म किसे कहते है ?

धर्म किसे कहते है ?       जिस प्रकार प्राणों के बिना मनुष्य जीवित नहीं रह सकता, उसी प्रकार धर्म (नैतिक आचरण) के बिना मनुष्य का भी कोई महत्त्व नहीं।      धर्म आचरण की वस्तु है।धर्म केवल प्रवचन और वाद-विवाद का विषय नहीं।केवल तर्क-वितर्क में उलझे रहना धार्मिक होने का लक्षण नहीं है।धार्मिक होने का प्रमाण यही है कि व्यक्ति का धर्म पर कितना आचरण है। व्यक्ति जितना-जितना धर्म पर आचरण करता है उतना-उतना ही वह धार्मिक बनता है।'धृ धारणे' से धर्म शब्द बनता है, जिसका अर्थ है धारण करना। धर्म किसी संगठित लोगों के समुह का नाम नही न ही अभिमान व गर्व करने की वस्तु है ।        धर्म मनुष्य में शिवत्व /पवित्रता की स्थापना करना चाहता है।वह मनुष्य को पशुता के धरातल से ऊपर उठाकर मानवता की और ले जाता है और मानवता के ऊपर उठाकर उसे देवत्व की और ले-जाता है।यदि कोई व्यक्ति धार्मिक होने का दावा करता है और मनुष्यता और देवत्व उसके जीवन में नहीं आ पाते, तो समझिए कि वह धर्म का आचरण न करके धर्म का आडम्बर कर रहा है।     मनु महाराज के अनुसार धर्म की महिमा   ...

सत्याचरण ही सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है

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  ।।सत्याचरण ही सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है।। आचार्य श्री प्रेम आर्य, वैदिक पुरोहित, गया जी, 9304366018 ओ३म् व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्।            दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धाया सत्यमाप्यते।।                                          य०अ०- १९,मं०-३०  भावार्थ-           (व्रतेन) जो मनुष्य सत्य के आचरण को दृढ़ता से करता है, तब वह दीक्षा अर्थात उत्तम अधिकार के फल को प्राप्त करता है।(दीक्षयाप्नोति०) जब मनुष्य उत्तम गुणों से युक्त होता है, तब सब लोग सब प्रकार से उसका सत्कार करते हैं। क्योंकि धर्म आदि शुभ गुणों से ही उस दक्षिणा को मनुष्य प्राप्त होता है, अन्यथा नहीं।(दक्षिणा श्र०) जब ब्रह्मचर्य आदि सत्यव्रतों से अपना और दूसरे मनुष्यों का अत्यंत सत्कार होता है, तब उसी में दृढ़ विश्वास होता है। क्योंकि सत्य धर्म का आचरण ही मनुष्यों का सत्कार करने वाला है।(श्रद्धया) फिर सत्य के आचरण में जितनी जितनी अधिक ...

धर्म क्या है ?

  धर्म क्या है ?  =============    धर्म वह है जो मनुष्य मात्र का कल्याण करने में समर्थ हो,किसी व्यक्ति या वर्ग विषेश का नहीं।        धर्म वह है जो जीवन के सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त करे।बौद्धिक,आत्मिक,शारीरिक,सामाजिक,राष्ट्रीय उन्नति के लिए प्रेरणा दे;जिसमें समानता,एकता,परस्पर प्रेम,सौहार्द,सद्भावना,समदृष्टि उत्पन्न करने की क्षमता हो;जो कर्तव्य पालन के प्रति सचेत करे।ऐसे धर्म को धारण करके मनुष्य का इहलोक भी सुधर सकता है और परलोक भी।       धर्म के प्रति यह दार्शनिक दृष्टिकोण कितना उदात्त व विशाल है।       यतोअभ्युदयनि: श्रेयसस्सिद्धि स धर्म: ।     जिससे लौकिक और पारलौकिक उन्नति हो,वही धर्म है।       पारलौकिक उन्नति से अभिप्राय आत्मिक और पारमार्थिक उन्नति है,अर्थात् केवल भौतिक उन्नति ही जीवन के लिए आवश्यक नहीं है अपितु आत्मिक उन्नति की आवश्यकता उससे भी कहीं अधिक है।         भौतिक उन्नति शरीर के लिए है और आत्मिक उन्नति आत्मा के लिए है।दोनों प्रकार की उन्नति ही मनुष्य के ...

जीवात्माओं वा मनुष्यों के शरीरों की आकृति व सामर्थ्य में भेद का कारण”

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 ओ३म् “जीवात्माओं वा मनुष्यों के शरीरों की आकृति व सामर्थ्य में भेद का कारण” ========== जीवात्मा जन्म-मरणधर्मा है। ईश्वर की व्यवस्था से इसे अपने पूर्वजन्मों के कर्मानुसार जाति, आयु व भोग प्राप्त होते हैं। इन तीनों कार्यों को प्राप्त करने में यह परतन्त्र है। जीव मनुष्य योनि में जन्म लेने के बाद कर्म करने में तो स्वतन्त्र है परन्तु उनके फल इसे ईश्वर की व्यवस्था से मिलते हैं जिसमें यह परतन्त्र होता है। यह भी ज्ञातव्य है कि मनुष्य योनि उभय योनि होती है। इस योनि में मनुष्य स्वतन्त्रतापूर्वक कर्म करता है और अपने पूर्व किये हुए कर्मों के फलों को भोगता भी है। फलों के भोग में यह परतन्त्र होता है। मनुष्य से इतर सभी योनियां केवल भोग योनियां होती है। इन योनियों में जीवात्मा अपने पूर्वजन्म के कर्मों के फलों का भोग ही करता है। पशु आदि भोग योनियों में वह अपनी बुद्धि से सोच कर कोई धर्म व परमार्थ का कार्य नहीं कर सकता। उसके सभी भोग, अर्थात् सुख और दुःख, ईश्वर से निर्धारित होते हैं। इन भोग योनियों में हमारी मनुष्य योनि की जीवात्मा को भी परजन्म लेकर दुःख न उठाने पड़े, इसीलिये मनुष्य योनि में हमें सत्य...

यदि ऋषि दयानन्द न आते तो क्या होता आर्य समाज मंदिर गया जी

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 ओ३म् “यदि ऋषि दयानन्द न आते तो क्या होता?” ========= ऋषि दयानन्द का जन्म 12 फरवरी, 1825 को गुजरात राज्य के मोरवी जिले के टंकारा कस्बे में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री कर्षनजी तिवारी था। जब उनकी आयु का चौदहवां वर्ष चल रहा था तो उन्होंने अपने  शिवभक्त पिता के कहने पर शिवरात्रि का व्रत रखा था। शिवरात्रि को अपने कस्बे के बाहर कुबेरनाथ के मन्दिर में पिता व स्थानीय कुछ लोगों के साथ उन्होंने रात्रि जागरण करते हुए चूहों को मन्दिर के अन्दर बने हुए बिलों से निकलकर शिवलिंग पर भक्तों द्वारा चढ़ाये गये अन्नादि पदार्थों को खाते देखा था। इससे उनकी शिव की मूर्ति में श्रद्धा, विश्वास एवं आस्था समाप्त हो गई थी। उनमें सच्चे शिव को जानने व प्राप्त करने की इच्छा व संकल्प उत्पन्न हुआ था। उसके बाद उनकी बहिन व चाचाजी की मृत्यु होने पर उन्हें वैराग्य हो गया था। सच्चे शिव को जानने और जन्म व मृत्यु के बन्धन से मुक्त होने के लिए उन्होंने अपनी आयु के बाईसवें वर्ष में गृहत्याग कर दिया था। आरम्भ में वह गुजरात में अनेक स्थानों पर रहकर धार्मिक विद्वानों व योगियों के सम्पर्क में आये थे और उनसे अपने प्रश्नों क...

शुभ विवाह की वर्षगांठ पर, सौ-सौ बार बधाई हो।

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  शुभ विवाह की वर्षगांठ पर, सौ-सौ बार बधाई हो। शुभ विवाह की वर्षगांठ पर, सौ-सौ बार बधाई हो। सदा रहो तुम मिलकर ऐसे, जैसे दूध मलाई हो। तुमने जीवन साथी बनकर इतने वर्ष बिताये हैं। इक-दूजे का हाथ पकड़कर इस मंजिल तक आये हैं। आपस की यह प्रीति हमेशा, हर दिन रात सवाई हो। सदा रहो मिलकर तुम ऐसे, जैसे दूध……… (1) यह आदर्श जीवन तुम्हारा सबको राह दिखाता है। सद्-गृहस्थ ऐसा होता है यह सन्देश सुनाता है। तन-मन-धन से जन-गण- मन की सेवा और भलाई हो। सदा रहो मिलकर तुम ऐसे, जैसे दूध…….. (2) पति-पत्नी दो पहिये समझो, अपने घर की गाड़ी के दोनों ही माली हैं सुन्दर, फूलों की फुलवारी के। जीवन स्वर्ग बने धरती पर, ऐसी नेक कमाई हो। सदा रहो मिलकर तुम ऐसे, जैसे दूध………. (3) सुखद स्वास्थ्य का तुम दोनों के, जीवन को आधार मिले बीते समय प्रभु भक्ति में, परमेश्वर का प्यार मिले ‘पथिक’ चलो सुख की राहों पर, ईश्वर सदा सहाई हो सदा रहो तुम मिलकर ऐसे जैसे दूध मलाई हो शुभ विवाह की वर्षगांठ पर सौ-सौ बार बधाई हो। सदा रहो मिलकर तुम ऐसे, जैसे दूध………. (4)

*क्या मृत्यु के पश्चात श्राद्ध करना ठीक है

 क्या मृत्यु के पश्चात श्राद्ध करना ठीक है ? *वेद में कहा गया है, "भस्मान्तम् शरीरम् ।"*  *और यह अन्तिम क्रिया है । इसके पश्चात कोई क्रिया शेष नहीं रहती है । हां, उन अस्थियों को हम निर्जन स्थान में भूमि मे दबा दें । हम बाद में भी शरीर के लिये कुछ काम परम्परा के नाम पर करते हैं । कोई तीसरे दिन करता है, कोई पांचवें, कोई सातवें, कोई नवें, कोई ग्यारहवें, कोई तेरहवीं और कोई बरसी करता है । वास्तव में जिसकी मृत्यु हो गई, अब उससे हमारा कोई सम्बन्ध नहीं रहा । क्योंकि सम्बन्ध तो शरीर से होते हैं । आत्मा का तो किसी से कोई सम्बन्ध नहीं होता है ।* *मृत्योपरान्त आत्मा नया शरीर धारण कर लेता है । अब हम किसी को भोजन खिलाकर स्वयं तृप्त हो जायें या अपनी आत्मा को प्रसन्न करें यह अलग बात है । किसी दूसरे को खिलाकर तीसरे की तृप्ति होगी यह विचार ही मिथ्या है । क्योंकि भोजन का सम्बन्ध शरीर से है, आत्मा से नहीं । यह भोजन आत्मा को मिलता ही नहीं । जब हम जीवित रहते हैं, तब भी शरीर के लिए खाते हैं, आत्मा के लिए नहीं ।*          *ये शरीर तो आत्मा का साधन है, रथ है, वाहन है और वह भो...