प्रभु नाम के साबुन से जो, मन का मैल छुड़ाएगा। निर्मल मन के दर्पण में वह, प्रभु का दर्शन पाएगा॥

  प्रभु नाम के साबुन से जो, मन का मैल छुड़ाएगा। निर्मल मन के दर्पण में वह, प्रभु का दर्शन पाएगा॥ नर शरीर अनमोल रे प्राणी, प्रभु कृपा से पाया है। झूठे जग प्रपंच में पड़ कर, क्यों प्रभु को बिसराया है। समय हाथ से निकल गया तो, समय हाथ से निकल गया तो, सिर धुन धुन पछताएगा। निर्मल मन के दर्पण में वह, प्रभु का दर्शन पाएगा॥  झूठ कपट निंदा को त्यागो, हर प्राणी से प्यार करो। घर पर आये अतिथि कोई तो, यथाशक्ति सत्कार करो। क्यों, पता नहीं किस रूप में आकर, पता नहीं किस रूप में आकर, नारायण मिल जाएगा। निर्मल मन के दर्पण में वह, प्रभु का दर्शन पाएगा॥  साधन तेरा कच्चा है, जब तक प्रभु पर विश्वास नहीं, मंजिल कर पाना है क्या, जब दीपक में प्रकाश नहीं। निश्चय है तो भवसागर से, निश्चय है तो भवसागर से, बेड़ा पार हो जाएगा। निर्मल मन के दर्पण में वह, प्रभु का दर्शन पाएगा॥  दौलत का अभिमान है झूठा, यह तो आनी जानी है। राजा रंक अनेक हुए, कितनों की सुनी कहानी है। ॐ नाम प्रिय महामंत्र ही, ॐ नाम प्रिय महामंत्र ही, साथ तुम्हारे जाएगा। निर्मल मन के दर्पण में वह, प्रभ...

ईश्वर का सत्ता

 *ईश्वर का सत्ता*

"श्रदस्मै धत्त स जनास इन्द्रः  |"

           (ऋ० २/१२/५)

           हे मनुष्यो ! इस परमेश्वर पर श्रद्धा करो वह परमैश्वर्यवान प्रभु है ।

नास्तिक वैज्ञानिक कहते हैं, 

ईश्वर की सिद्धि प्रयोगशाला में हो, तो हम ईश्वर के सत्ता को मानने को तैयार हैं अन्यथा नहीं ।

इनकी यह धारणा ठीक नहीं ।ईश्वर सृष्टि और शरीररुपी प्रयोगशाला में सिद्ध होता है ।

महर्षि दयानन्द जी ने सत्यार्थ प्रकाश में लिखते हैं, इन्द्रियों और मन से गुणों का प्रत्यक्ष होता है गुणी का नहीं ।

पांचों इन्द्रियों से स्पर्श, रुप, रस, गन्ध का ज्ञान होने से गुणी जो पृथ्वी है, उसका आत्मायुक्त मन से प्रत्यक्ष किया जाता है, वैसे इस प्रत्यक्ष सृष्टि की रचना विशेष में ज्ञानादि गुणों के प्रत्यक्ष होने से परमेश्वर का भी प्रत्यक्ष है ।

शरीर की अद्भुत रचना को देखकर ईश्वर की सत्ता का प्रत्यक्ष होता है ।

*संसार परमात्मा में स्थित है।*

श्वेतकेतु की समझ में नहीं आ रहा था कि यह नाना रुपों वाला जगत मात्र एक ही तत्व 'सत' से किस प्रकार उत्पन्न हो सकता है ।

 उसने अपने पिता ऋषि उद्दालक से जिज्ञासा की, तो उद्दालक ने कहा, ''वत्स, वटवृक्ष का एक फल ले आओ ।''

श्वेतकेतु फल ले आया ।

उद्दालक ने कहा, "इसको तोड़ो और बताओ कि इसमें तुमने क्या देखा ?"

''इसमें अनेक छोटे छोटे बीज हैं |'' उद्दालक ने बताया ।

उद्दालक ने उनमें से कोई एक बीज तोड़ने को कहा और पूछा, "अब, इसमें क्या देखते हो ?''

"कुछ नहीं ।" श्वेतकेतु ने सहज भाव से उत्तर दिया ।

ऋषि उद्दालक ने समझाते हुए कहा, "तुम इस बीज में अंतर्निहित सूक्ष्म पदार्थ को इन आंखों से नहीं देख पा रहे हो और न ही उसकी अनुभूति कर पा रहे हो । परन्तु अपनी समस्त शाखाओं-प्रशाखाओं सहित यह विशाल वटवृक्ष इसमें स्थित है । ठीक इसी प्रकार यह सारा संसार उस मात्र एक तत्व 'सत्' में समाहित है ।'' 

श्वेतकेतु की जिज्ञासा शांत हो गयी ।

*संसार में व्यापक होते हुए भी वह दिखायी नहीं देता ।*

एक सन्त से किसी ने पूछा, ''ईश्वर है तो दिखायी क्यों नहीं देता ?"

 सन्त ने कहा, ''ईश्वर अनुभूति का विषय है । उसे देखने का कोई उपाय नहीं है । हां, उसे अनुभव अवश्य किया जा सकता है ।''

प्रश्नकर्ता ने असन्तुष्ट होकर कहा, ''यह बात समझ में नह़ी आयी ।''

सन्त ने पास में पड़ा एक पत्थर उठाया और अपने पांव पर दे मारा । उनके पैर में गहरी चोट आयी । 

प्रश्नकर्ता आश्चर्य होकर बोला, ''यह क्या किया आपने ? इससे क्या आपको पीड़ा नहीं होगी ?"

सन्त ने हंसते हुए कहा, ''पीड़ा दिखती नहीं, फिर भी है । ऐसे ही ईश्वर भी दिखता नहीं, परन्तु है ।"

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