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प्रभु सारी दुनियाँ से ऊँची तेरी शान है। कितना महान् है तू कितना महान् है।

 ईश महिमा प्रभु सारी दुनियाँ से ऊँची तेरी शान है।  कितना महान् है तू कितना महान् है। यहाँ वहाँ कोने-कोने तू ही मशहूर है।  निकट से निकट और दूर से भी दूर है।  'तुझमें समाया हुआ सकल जहान है।' कितना महान् है तू कितना महान् है ...... तू ही एक मालिक है सारी कायनात का।  फूलों भरी क्यारियों का तारों की जमात का।  तेरी ही जमीन है यह तेरा आसमान है। कितना महान् है तू कितना महान् है. सबने जो रंक देखे सभी तेरे रंग हैं।  जग में अनेक तेरे पालने के ढंग हैं।  तुझको तो छोटे-बड़े सबका ही ध्यान है। कितना महान् है तू कितना महान् है. जितने भी दुनियाँ में जीव देहधारी हैं।  सभी तेरे प्यार के समान अधिकारी हैं।  'पथिक' सभी को दिया तूने वरदान है। कितना महान् है तू कितना महान् है

ईश्वर का सत्ता

 *ईश्वर का सत्ता* "श्रदस्मै धत्त स जनास इन्द्रः  |"            (ऋ० २/१२/५)            हे मनुष्यो ! इस परमेश्वर पर श्रद्धा करो वह परमैश्वर्यवान प्रभु है । नास्तिक वैज्ञानिक कहते हैं,  ईश्वर की सिद्धि प्रयोगशाला में हो, तो हम ईश्वर के सत्ता को मानने को तैयार हैं अन्यथा नहीं । इनकी यह धारणा ठीक नहीं ।ईश्वर सृष्टि और शरीररुपी प्रयोगशाला में सिद्ध होता है । महर्षि दयानन्द जी ने सत्यार्थ प्रकाश में लिखते हैं, इन्द्रियों और मन से गुणों का प्रत्यक्ष होता है गुणी का नहीं । पांचों इन्द्रियों से स्पर्श, रुप, रस, गन्ध का ज्ञान होने से गुणी जो पृथ्वी है, उसका आत्मायुक्त मन से प्रत्यक्ष किया जाता है, वैसे इस प्रत्यक्ष सृष्टि की रचना विशेष में ज्ञानादि गुणों के प्रत्यक्ष होने से परमेश्वर का भी प्रत्यक्ष है । शरीर की अद्भुत रचना को देखकर ईश्वर की सत्ता का प्रत्यक्ष होता है । *संसार परमात्मा में स्थित है।* श्वेतकेतु की समझ में नहीं आ रहा था कि यह नाना रुपों वाला जगत मात्र एक ही तत्व 'सत' से किस प्रकार उत्पन्न हो सकता है ।  उ...

ईश्वर के गुण

 *ईश्वर के गुण* १) वह चेतन दिव्य शक्ति परमेश्वर एक ही है । अर्थात कोई दूसरा उसके तुल्य वा अधिक नहीं । २) वह द्रष्टा है, और सब जगत में परिपूर्ण होकर जड़ तथा चेतन दोनों प्रकार के जगत को देखता है, उसका कोई द्रष्टा (अध्यक्ष) नहीं और वह स्वयं किसी का दृश्य भी नहीं हो सकता है । ३) वह सर्वज्ञ है, अर्थात् सब कुछ जानता है, और उसका ज्ञान संसार की सब वस्तुओं से प्रकट होता है । ४) वह सर्वव्यापक है, अर्थात सूक्ष्म से सूक्ष्म और महान् पदार्थ के अन्दर और बाहर ओत-प्रोत है । वह इस ब्रह्माण्ड में पूर्ण (सर्वत्र व्याप्त) हो रहा है । वह सूक्ष्मतर से भी सूक्ष्मतम और महत्तर से भी महत्तम है । इससे कोई सूक्ष्म तथा बड़ी वस्तु न तो है, न होगी और न थी । ५) वह स्वयं स्थिर है । जैसे एक वृक्ष शाखा, पत्र तथा पुष्पादिकों को धारण करता है, उसी प्रकार परमेश्वर पृथ्वी, सूर्यादि समस्त जगत को धारण करता हुआ, उसमें व्यापक होकर ठहरा हुआ है । जैसे आकाश के बीच में सब पदार्थ रहते हैं, परन्तु आकाश सबसे अलग रहता है, अर्थात किसी से बंधता नहीं, इसी प्रकार परमेश्वर को भी जानना चाहिये । ६) वह सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान है, क्योंकि उ...

वैदिक विचार

 *वैदिक विचार*    *पूजा* किसी वस्तु का सम्मान कर, उससे यथायोग्य लाभ लेना, पूजा है । *ईश्वर पूजा* ईश्वर के उपदेशों का पालन कर ज्ञान व आनन्द लेना, ही ईश्वर की पूजा अथवा ईश्वरभक्ति करना कहलाता है । *ईश्वरभक्ति की विधि* ईश्वर के तुल्य अपने गुण, कर्म, स्वभाव को बनाना । *ईश्वरभक्ति के लाभ* आत्मबल की प्राप्ति, पूर्ण सुखशांति व ईश्वर की प्राप्ति । ईश्वर की मूर्ति पर *फल-फूल का चढ़ावा* नहीं, मूर्ति जड़ है । ईश्वर चेतन व निराकार है उस पर फल, फूल जलादि नहीं चढ़ा सकते हैं ।  *ईश्वर की मूर्ति में प्राणप्रतिष्ठा* यह प्राणप्रतिष्ठा नहीं, पाखंड प्रतिष्ठा है, क्योंकि प्राणप्रतिष्ठा के बाद भी मूर्ति जीवित और चेतन नहीं होती है ।  ईश्वर का सही स्वरूप जानने के लिए मूर्तिपूजा ठीक नहीं है | बच्चों को शुरु में २×८= १६ सिखाते हैं, अथवा २×८ = ८ । तब गणित के समान विद्या-विज्ञान के दाता ईश्वर के स्वरूप को ही ठीक न सीखना व सिखाना महापाप, महाअन्याय है । ईश्वर कण-कण में है । जड़ मूर्ति में ईश्वर के समान ज्ञान, बल व सर्वज्ञता आदि गुण नहीं है ।  *अवतार* कहते हैं, उतरने को । सर्वव्यापक होने...

मानव जीवन का लक्ष्य

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  *मानव जीवन का लक्ष्य* संसार में तीन वस्तुएं होती है - साध्य, साधक और साधन । "साध्य'' का अर्थ है, जिसे हम सिद्ध करना चाहते हैं अथवा प्राप्त करना चाहते हैं । ''साधक'' उसे कहते हैं, जो साध्य को प्राप्त करना चाहता है ।  और ''साधन'' उसे कहते हैं, जिसकी सहायता से साधक अपने साध्य तक पहुंच पाता है । वैदिक परिभाषाओं के अनुसार,  ''ईश्वर'' अथवा मोक्ष प्राप्ति साध्य है ।  ''आत्मा'' साधक है ।  और धन, संपत्ति, भोजन, वस्त्र, मकान आदि मोक्ष प्राप्ति के साधन हैं । संसार में कुछ लोग ईश्वर या मोक्ष प्राप्ति के लिए ईमानदारी से पुरुषार्थ करते हैं । वे लोग सच्चे साधक हैं । वे धन, भोजन, वस्त्र, मकान आदि साधन सीमित मात्रा में संग्रहित करते हैं । इन साधनों की सहायता से वेदों एवं दर्शन शास्त्रों की विद्या अर्जित कर वे समाधि लगाते हैं । इनकी सहायता से वे अपने साध्य ईश्वर या मोक्ष तक पहुंच जाते हैं । वही लोग वास्तव में सही दिशा में चल रहे होते हैं । अधिकांश लोग तो साध्य को समझते ही नहीं । जीवन में मात्र भोग करना, धन कमाना, संपत्ति जमा ...

वैदिक सन्ध्या

 वैदिक सन्ध्या ओ३म्‌ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्‌ ॥ -यजु. ३६.३ ओ३म्‌ शन्नो देवीरभिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये। शंयोरभि स्रवन्तु नः॥ -यजु. ३६.१२ (दाहिने हाथ में जल लेकर तीन बार आचमन करें) ओं वाक्‌ वाक्‌। ओं प्राणः प्राणः। ओं चक्षुः चक्षुः। ओं श्रोत्रं श्रोत्रम्‌। ओं नाभिः। ओं हृदयम्‌। ओं कण्ठः। ओं शिरः। ओं बाहुभ्यां यशोबलम्‌। ओं करतलकरपृष्ठे॥ (इन्द्रिय स्पर्श करें) ओं भूः पुनातु शिरसि। ओं भुवः पुनातु नेत्रयोः। ओं स्वः पुनातु कण्ठे। ओं महः पुनातु हृदये । ओं जनः पुनातु नाभ्याम्‌। ओं तपः पुनातु पादयोः। ओं सत्यम्‌ पुनातु पुनश्शिरसि। ओं खं ब्रह्म पुनातु सर्वत्र॥ (जल से मार्जन करें) ओं भूः। ओं भुवः। ओं स्वः। ओं महः। ओं जनः। ओं तपः। ओं सत्यम्‌॥ (प्राणायाम करें) ओं ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत। ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः॥ समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत। अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी॥ सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्‌। दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः॥ -ऋग्‌. १०.१९०.१-३ ओ३म्‌ शन्नो देवीरभिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये। शंयोरभि स्रव...

ईश्वर सर्वशक्तिमान् है" का वास्तविक तात्पर्य

 • "ईश्वर सर्वशक्तिमान् है" का वास्तविक तात्पर्य • • बुद्धि का एक गुण - ऊहापोह (सिद्धांत रक्षा - वाद-विवाद) • • ऊहा द्वारा सिद्धान्त को समझाने और उसकी रक्षा करने का चमत्कार ! • ------------------------------- - पंडित सत्यानन्द वेदवागीश घटना भारत के स्वतन्त्र होने से पूर्व की है। पेशावर-आर्यसमाज का वार्षिकोत्सव था। एक दिन रात्रि के अधिवेशन में पं० बुद्धदेव जी विद्यालंकार का 'ईश्वर' विषय पर व्याख्यान था। उस समय अध्यक्षता कर रहे थे वहाँ के डिप्टी कमिश्नर, जो थे तो मुसलमान पर सुपठित होने के कारण उदार विचारों के थे।  पण्डित जी ने व्याख्यान में ईश्वर के गुणों का वर्णन करते हुए 'सर्वशक्तिमान्' का अर्थ बताया - “सर्वशक्तिमान् का यही अर्थ है कि ईश्वर अपने कर्म करने में पूर्ण रूप से समर्थ है। अपने कर्मों के करने में वह किसी अन्य की सहायता नहीं लेता है। सृष्टि की रचना करना, सृष्टि का पालन करना, उसका संहार (प्रलय) करना और जीवों के कर्मों का निरीक्षण तथा तदनुसार फलप्रदान करना - ये जो ईश्वर के कर्म हैं, उनके करने में वह सम्पूर्ण शक्ति से युक्त है - सर्वशक्तिमान् है। किन्तु ...

ओ३म् का जाप सर्वश्रेष्ठ।

 ओ३म् ओ३म् का जाप सर्वश्रेष्ठ। ==============    ओ३म् का जाप स्मरण शक्ति को तीव्र करता है,इसलिए वेदाध्ययन में मन्त्रों के आदि तथा अन्त में ओ३म् शब्द का प्रयोग किया जाता है।     मनुस्मृति में आया है कि ब्रह्मचारी को मन्त्रों के आदि तथा अन्त में ओ३म् शब्द का उच्चारण करना चाहिए।      क्योंकि आदि में ओ३म् शब्द का उच्चारण न करने से अध्ययन धीरे धीरे नष्ट हो जाता है तथा अन्त में ओ३म् शब्द न कहने से वह स्थिर नहीं रहता है। २/७४ ।।      कठोपनिषद में नचिकेता की कथा आती है।नचिकेता ने यम ऋषि से पूछा- हे ऋषि,मुझे यह बताइये कि संसार में सार वस्तु क्या है?      इस पर ऋषि ने उत्तर दिया,सब वेद जिस नाम के संबंध में वर्णन करते हैं,सभी तपस्वी जिसके विषय में कहते हैं,जिसकी प्राप्ति की इच्छा करते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं,उस नाम के संबंध में मैं तुझे संक्षेप में बताता हूं-       वह ओ३म् नाम(शब्द) ही परमात्मा का श्रेष्ठतम नाम है।      यजुर्वेद में आया है कि मृत्यु को जीतने और मोक्ष को प्राप्त करने के लिए ओ...

वेदों के प्रश्नोत्तर सुनना,तुमको आज बताता हूँ। सुन करके जीवन में उतारो,वेद की बात बताता हूँ।

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               चतुर्वेद प्रश्नोत्तरी वेदों के प्रश्नोत्तर सुनना,तुमको आज बताता हूँ। सुन करके जीवन में उतारो,वेद की बात बताता हूँ। ।टेक।।  आदि सृष्टि में ईश्वर ने वेदों का हमको ज्ञान दिया।  क्या है करना क्या ना करना,प्रभु ने यह आदेश दिया। महाकवि का महाकाव्य है,वेद की बात बताता हूँ।।१।।  "ऋग्वेद " कौन है और कौन सा है,नाम तुम्हारा क्या बोलो। तुमको जानू तृप्त करूँ मैं,धन आदि से तुम बोलो।  सुखाभिलाषी श्रेष्ठवीर हूँ,वेद की बात बताता हूँ।।२।।  कर्म फल ईश्वर देता है,जीवमात्र है फल भोक्ता।  इस जग का आधार बताओ,कारण कार्य क्या होता। निमित्त कारण प्रभु को माना,वेद की बात बताता हूँ।।३।।  जग का भी आधार वही है,जग में वह आच्छादित है। पृथिवी द्यौ भी उसने बनाए,वह जग में अबाधित है। परमेश्वर ही परम पूज्य है वेद की बात बताता हूँ।।४।।  कौन रोकता पढ़ने से है ,विद्यार्थी से दूर रखे।  जो शिक्षक अच्छा है पढ़ाता,उनके पास उनको रखे। बनके विवेकी शिक्षित करना,वेद की बात बताता हूँ ।।५।।  अविनाशी से अविनाशी भी उसी ब्रह्म को है मान...

उपनिषद् में ईश्वर का विवरण

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 *उपनिषद् में ईश्वर का विवरण* "यद्वाचाऽनभ्युदितं, येन वागभ्युद्यते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि, नेदं यदिदमुपासते ।।"          (केन० १/४)         जो वाणी द्वारा प्रकाशित नहीं होता, जिससे वाणी का प्रकाश होता है, उसी को तू ब्रह्म जान । जिसका वाणी से सेवन किया जाता जाता है, वह ब्रह्म नहीं है । "यन्मनसा न मनुते, येनाहुर्मनो मतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि, नेदं यदिदमुपासते ।।"            (केन० १/५)           जिसका मन से मनन नहीं किया जाता, जिसकी शक्ति से मन मनन करता है, उसी को तू ब्रह्म जान । जिसका मन से मनन किया जाता है, वह ब्रह्म नहीं है । "यच्चक्षुषा न पश्यति, येन चक्षूंषि पश्यन्ति । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि, नेदं यदिदमुपासते ।।"           (केन. १/६)           जो आँख से नहीं देखा जाता, जिसकी शक्ति से आँख देखती है, उसी को तू ब्रह्म जान । जो आँख से देखा जाता है, वह ब्रह्म नहीं है । "यच्छ्रोत्रेण न श्रृणोति, येन श्रोत्रमिदं श्रुतम् । तदेव ब्रह...

ईश्वर का आश्रय ही सबसे बड़ा आश्रय

 *ईश्वर का आश्रय ही सबसे बड़ा आश्रय* # *ईश्वर* कहता है, "अहमिन्द्रो न परा जिग्य इद्धनं न मृत्यवेऽव तस्थे कदा चन । सोममिन्मा सुन्वतो याचता वसु न मे पूरवः सख्ये रिषाथन ।।"               (ऋ० १०/४८/५)               मैं परमैश्वर्यवान् सूर्य के सदृश सब जगत् का प्रकाश हूँ । कभी पराजय को प्राप्त नहीं होता और न कभी मृत्यु को प्राप्त होता हूँ । मैं ही जगद्रूप धन का निर्माता हूँ । सब जगत की उत्पत्ति करने वाले मुझ ही को जानो ।  हे जीवों ! ऐश्वर्य-प्राप्ति के यत्न करते हुए तुम लोग विज्ञानादि धन को मुझसे माँगो और तुम लोग मेरी मित्रता से अलग मत होओ । # *कठोपनिषद्* में यमाचार्य ने कहा है, "एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् । एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ।।"               (कठ० २/१७)               यह आश्रय श्रेष्ठ और सर्वोपरि है । इस आलम्बन को जानकर मनुष्य ब्रह्मलोक में आनन्दित होता है । # *रहीम* सुन्दर शब्दों में कहते हैं,  "अमरबेलि बिन मूल क...

रामसेतु निर्माण:

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*रामसेतु निर्माण:* क्या इसमें कहीं तैरने वाले पत्थरों का जिक्र आया? नल: मैं महासागरपर पुल बाँधनेमें समर्थ हूँ, अतः सब वानर आज ही पुल बाँधनेका कार्य आरम्भ कर दें' ॥ ५३ ॥ तब भगवान् श्रीरामके भेजनेसे लाखों बड़े-बड़े वानर हर्ष और उत्साहमें भरकर सब ओर उछलते हुए गये और बड़े-बड़े जंगलों में घुस गये ॥ ५४ ॥ वे पर्वतके समान विशालकाय वानरशिरोमणि पर्वतशिखरों और वृक्षों को तोड़ देते और उन्हें समुद्रnतक खींच लाते थे ॥ ५५ वे साल, अश्वकर्ण, धव, बाँस, कुटज, अर्जुन, ताल, तिलक, तिनिश, बेल, छितवन, खिले हुए कनेर, आम और अशोक आदि वृक्षोंसे समुद्रको पाटने लगे ॥ ५६-५७ ॥ वे श्रेष्ठ वानर वहाँ के वृक्षों को जड़से उखाड़ लाते या जड़ के ऊपर से भी तोड़ लाते थे। इन्द्रध्वजके समान ऊँचे- ऊँचे वृक्षोंको उठाये लिये चले आते थे ॥ ५८ ॥ ताड़ों, अनारकी झाड़ियों, नारियल और बहेड़ेके वृक्षों, करीर, बकुल तथा नीमको भी इधर-उधरसे तोड़-तोड़कर लाने लगे ॥ ५९ ॥ महाकाय महाबली वानर हाथीके समान बड़ी-बड़ी शिलाओं और पर्वतोंको उखाड़कर यन्त्रों (विभित्र साधनों) द्वारा समुद्रतटपर से आते थे ॥ ६० ॥ शिलाखण्डोंको फेंकनेसे समुद्रका जल सहसा आकाशमे...

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