वेदों में, ईश्वर को *दयालु एवं न्यायकारी* कहा गया है ।

 वेदों में, ईश्वर को *दयालु एवं न्यायकारी* कहा गया है । ईश्वर दयालु इसलिए है कि वे प्रत्येक उस व्यक्ति को उसके द्वारा किये गये पाप कर्म का दण्ड अवश्य देते हैं, जिससे वह व्यक्ति आगे उस पाप कर्म को न करे ।  इसे दयालुता ही तो कहेगें, नहीं तो पापी व्यक्ति को दण्ड ना मिले तो दिन-प्रतिदिन बड़े से बड़ा पाप करने में वह सलंग्न रहेगा, जिससे की सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था नष्ट हो जायेगी ।  और न्यायकारी इसलिए कहा गया है कि किसी को भी उतना ही दण्ड मिलता है, जितने उसने पाप किया है | आज कुछ अज्ञानियों ने ईश्वर की न्याय व्यवस्था को न समझ कर शनि की मूर्ति पर तेल चढ़ाने से पापों का क्षमा होना प्रचारित कर दिया है । यह ना केवल ईश्वर की कर्म फल व्यवस्था का अपमान है, अपितु अपने आपको भी मुर्खता के घोर अंधकार में रखने के समान है । तेल चढ़ाने से ना तो कोई पाप कर्म क्षमा होता है, और ना ही अपने द्वारा किये गये पापों के कारण मिलने वाले दण्ड से मनुष्य बच पाता है । आप अपनी तर्कशील बुद्धि का प्रयोग कर स्वयं निर्णय करें कि वे सत्य का वरण करना चाहेगें, अथवा असत्य का वरण करना चाहेगें । और यही सत्यार्थ प्रकाश का...

ईश्वर का स्वरुप

 *ईश्वर का स्वरुप*

 "अजो न क्षां दाधार पृथिवीं तस्तम्भ द्यां मन्त्रेभिः सत्यैः ।

प्रिया पदानि पश्वो निपाहि विश्वायुरग्ने गुहा गुहं गाः ।।"

        (ऋ० १/६७/३)

       जैसे अज अर्थात न जन्म लेने वाला अजन्मा परमेश्वर न टूटने वाले विचारों से पृथिवी को धारण करता है, विस्तृत अन्तरिक्ष तथा द्यौलोक को रोके हुए है, प्रीतिकारक पदार्थों को देता है, सम्पूर्ण आयु देने वाला, बंधन से सर्वथा छुड़ाता है, बुद्धि में स्थित हुआ वह गोप्य पदार्थ को जानता है, वैसे तू भी हे विद्वान जीव! हमें प्राप्तव्य की प्राप्ति करा ।

"प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा विजायते । 

तस्य योनि परिपश्यन्ति धीरास्तस्मिन् ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा ।।"

      (यजु० ३१/१९)

      अपने स्वरुप से उत्पन्न न होने वाला अजन्मा परमेश्वर, गर्भस्थ जीवात्मा और सबके ह्रदय में विचरता है और उसके स्वरुप को धीर लोग सब और देखते हैं ।उसमें सब लोक लोकान्तर स्थित है ।

"ब्रह्म वा अजः ।"

      (शतपथ० ६/४/४/१५)

      ब्रह्म ही अजन्मा है ।

उपनिषदों में भी परमात्मा को स्थान-स्थान पर अजन्मा वर्णन किया है |

"वेदाहमेतमजरं पुराणं सर्वात्मानं सर्वगतं विभुत्वात् ।

जन्मनिरोधं प्रवदन्ति यस्य ब्रह्मवादिनो प्रवदन्ति नित्यम् ।।"

      (श्वेता० ३/२१)

      मैं उस ब्रह्म को जानता हूं जो पुराना है और अजर है । सबका आत्मा और विभु होने से सर्वगत है । ब्रह्मवादी जिसके जन्म का अभाव बतलाते हैं | क्योंकि वह नित्य है ।

*प्रश्न* :- ईश्वर निराकार है अथवा साकार अथवा दोनों निराकार भी साकार भी ।

*उत्तर* :- ईश्वर निराकार ही है और तीनों कालों में निराकार ही रहता है ।

 *प्रश्न* :- वेद में ईश्वर को साकार भी कहा है :-

"विश्वतश्चक्षु विश्वतो मुखो विश्वतो बाहुरूत विश्वतस्पात् |"

        (यजुर्वेद अ. १७ /मं. १९)

"सहस्र शीर्षा पुरुषः सहस्राक्ष सहस्रपात् ।"

        (यजुर्वेद अ. ३१/ मं. )

"ब्राह्मणोस्य मुखमासीद् बाहुराजन्यः कृतः ऊरुतदस्य यद्वैश्य पद्भ्याम् शूद्रो अजायत ।।"

       (यजुर्वेद अ. ३१/मं. ११)

       वह ईश्वर सब और से आँखों वाला, सब और से मुखों वाला, सब ओर से हाथों वाला और सब ओर से पैरों वाला है । वह ईश्वर सहस्र सिरों वाला, सहस्र आंखों वाला और सहस्र पैरों वाला है ।

ब्राह्मण ईश्वर के मुख से, क्षत्रिय  बाहु से, वैश्य ऊरु से और शूद्र ईश्वर के पैरों से उत्पन्न हुआ । 

सहस्र सिर, सहस्र आँखें और सहस्र पैर साकार के ही होते हैं ।अतः ईश्वर साकार भी है ।

*उत्तर* :- यदि ईश्वर साकार है तो दिखना चाहिये, परन्तु दिखता नहीं ? 

दूसरे यदि ईश्वर साकार है तो उसका शरीर कितना बड़ा है ?

यदि चींटी के समान शरीर है, तो सूर्य, भूमि, चन्द्रादि लोकों को धारण नह़ी कर सकता,

 और यदि पर्वत के समान शरीर है, तो चींटी आदि छोटे जन्तुओं के सिर में आँख जैसी सूक्ष्म वस्तु की रचना नहीं कर सकता । 

यदि एक ही समय में ईश्वर निराकार और साकार दोंनो प्रकार का है, तो दो विरोधी बातें ईश्वर में नहीं हो सकती ? क्योंकि, 

"नैकस्मिन्न सम्भवात् |"

      (वेदान्त० २/२/३३)

"विप्रतिषेधाच्च |"

      (वेदान्त २/२/४५)

      एक ही वस्तु में एक साथ दो विरोधी धर्म नहीं रह सकते ।

जैसे निराकार और साकार ।

निराकार और साकार दोनो का परस्पर में विरोध होने से निराकार ईश्वर साकार नहीं हो सकता ।

अतः ईश्वर निराकार है और तीनों कालों में निराकार ही रहता है | क्योंकि वेदादि शास्त्रों में ईश्वर को निराकार निर्विकार कूटस्थ (न बदलने वाला) एकरस कहा है, और जो वेदमन्त्र ईश्वर को सब और से आँखों वाला, सब ओर से मुखों वाला, सब और से हाथों वाला, सब और से पैरों वाला तथा सहस्र सिरों वाला, सहस्र आँखों वाला, सहस् पैरों वाला कहते हैं, उनका भी अर्थ ईश्वर को निराकार ही बतलाना है । सचमुच आँख, मुख, सिर, हाथ, पैर नहीं ।

प्रथम वेद मन्त्र में ईश्वर को विश्वत चक्षु अर्थात सब ओर से आँखों वाला, 'विश्वत मुख' अर्थात सब और से मुखों वाला, 'विश्वत पात' अर्थात सब ओर से पैरों वाला कहा है ।

'विश्वत' शब्द का अर्थ है 'सब और से' अथवा "सर्वत्र" |

किसी भी शरीरधारी के सहस्रों, लाखों, करोड़ों सिर, आँख, हाथ, पैर होने पर भी 'सब ओर' या"सर्वत्र" नहीं हो सकते ।

जहाँ या जिस ओर मुख है, वहीं या उस ओर पैर नहीं हो सकते और जिस ओर या जहाँ पैर हैं, वहाँ उस ओर आँखें नहीं हो सकती । और वहाँ या उस ओर हाथ नहीं हो सकते और जिस ओर या जहाँ हाथ हैं, वहाँ या उस ओर पैर और आंखें नहीं हो सकती ।

अतः इस प्रकार इस मन्त्र का अर्थ यह हुआ कि, 

वह ईश्वर,

सब ओर से आँखों वाला है अर्थात् 'सर्वदृष्टा है |

सब ओर से मुखों वाला है अर्थात 'सब ओर से उपदेशक है । 

सब ओर से हाथों वाला है अर्थात सब प्रकार से अनन्त बल वाला है । 

सब ओर से पैरों वाला है अर्थात् सर्वत्र व्याप्ति वाला है । अपनी सर्वव्यापक अनन्त शक्ति रुपी पैंरों से जानो सर्वत्र पहुंचा हुआ है ।

दूसरे वेदमन्त्र में भी ईश्वर को निराकार ही कहा है । क्योंकि उसमें भी 'सहस्र' और 'पुरुष' शब्द है । सहस्र का अर्थ 'सर्व और असंख्यात' है । 

"सर्व वै सहस्रम् सर्वस्य दाताsसीत्यादि |"

     (शतपथ कांड ७/अ. ५)

 पुरुष' का अर्थ है 'व्यापक'

"पुरुषं पुरिशय इत्याचचक्षीरन |" 

     (निरुक्त अ. १/ख. १३)

     ब्रह्माण्ड में 'व्यापक' होने से ईश्वर को पुरुष कहते हैं । और शरीर में शयन करने से जीव को पुरुष कहते हैं ।

"तेनेदम पूर्णम् पुरुषेण सर्वम् |"

      (निरुक्त अ. २/ खं. ३)

     तथा 

      (श्वेताश्वतर-उपनिषद अ. ३/ मं. ९)

       उस सबमें पूर्ण व्यापक पुरुष से यह सब जगत पूर्ण है, व्यापक निराकार ही होता है,साकार नहीं ।

  अतः इस दूसरे वेद मन्त्र का अर्थ यह हुआ कि, 

'सहस्र' सिरों वाला है अर्थात् सर्वज्ञ है' | 

सहस्र आंखों वाला है अर्थात् 'सर्वदृष्टा है' | 

सहस्र पैरों वाला है अर्थात सर्वव्यापक है ।

अनन्त सर्वव्यापक होने से वह अनन्त सर्वव्यापक शक्ति रुपी पैरों से सर्वत्र पहुंचा हुआ है |

तीसरे वेद मन्त्र में भी ईश्वर को निराकार ही कहा है, क्योंकि इसमें भी 'पुरुष' शब्द है जिसका अर्थ 'व्यापक' है, जो अभी पहले कह चुके हैं ।

कहा भी है, 

"सर्वानन शिरोग्रीवः सर्वभूतागुहाशयः ।

सर्वव्यापी स भगवान तस्मात्सर्वगतः शिवः ।।"

        (श्वेताश्वतर उपनि० अ. ३/मं. ११)

         सर्वत्र ही जिसके मुख, सिर, गर्दन हैं । जो सब भूतों की हृदय रुपी गुफा में रहता है, वह भगवान सर्वव्यापक है । इसलिए सबमें स्थित शिव (कल्याणकारी) है ।

अतः ईश्वर निराकार ही है, क्योंकि निराकार ही सर्वव्यापक हो सकता है । साकार एकदेशी होता है ।

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