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दुनिया बनाने वाले, महिमा तेरी निराली चन्दा बनाया शीतल, सूरज में आग डाली

 *आज का वैदिक भजन* दुनिया बनाने वाले, महिमा तेरी निराली चन्दा बनाया शीतल, सूरज में आग डाली ऊँचे शिखर गिरी के, आकाश चूमते हैं वृक्षों के झुरमुटे भी, वायु में झूमते हैं सरिताऐं बहती कल-कल, निर्मल से नीर वाली चन्दा बनाया शीतल, सूरज में आग डाली दुनिया बनाने वाले फूलों का चूस कर रस, कैसा मधु बनाये मधुमक्खी में भी तूने, क्या यंत्र है लगाये मधु सबके मन को भाये, लाला हो चाहे लाली चन्दा बनाया शीतल, सूरज में आग डाली दुनिया बनाने वाले पत्तों को खा के कीड़ा, रेशम बना रहा है है कौन जो उदर में, चरखा चला रहा है बुन-बुन के आ रहा है, रेशम का लच्छा जाली चन्दा बनाया शीतल, सूरज में आग डाली दुनिया बनाने वाले बरसात के दिनों में, लेंटर टपकते देखा बयें के घोंसले में, पायी न जल की रेखा क्या तकनीकी सिखाई, तूने ओ जग के वाली चन्दा बनाया शीतल, सूरज में आग डाली दुनिया बनाने वाले जुगनू की दुम में तूने, क्या बल्ब है लगाया बरसात की निशा में, जंगल है जगमगाया पक्षी चकोर के क्या, आँखों में कशिश डाली चन्दा बनाया शीतल, सूरज में आग डाली दुनिया बनाने वाले मोरों के पंख देखो, क्या विचित्र चित्रकारी कोयल बनाई काली, आवाज प्या...

इक बार भजन कर ले, मुक्ति का यतन कर ले। कट जायेंगे जनम मरण, प्रभु का चिन्तन कर ले।।

 इक बार भजन कर ले, मुक्ति का यतन कर ले।  कट जायेंगे जनम मरण, प्रभु का चिन्तन कर ले।। इक बार भजन कर ले .......................... यह मानव का चोला, हर बार नहीं मिलता,  जो गिर गया डाली से, वो फूल नहीं खिलता,  मौका है ये जीवन का, गुलजार चमन कर ले।। इक बार भजन कर ले.............................. नर इन कानों से सुन, तू ऋषियों की वाणी,  मन को ठहरा कर के, बन जा आत्मज्ञानी,  जिह्वा तो चले मुख में, अब ओ३म् जपन कर ले।। इक बार भजन कर ले................................ इस मैली चादर में, हैं दाग लगे कितने,  पर ज्ञान के साबुन में, हैं झाग भरे इतने,  धुल जाएगी सब स्याही, उजला तन मन कर ले।। इक बार भजन कर ले. .......,...................... वेदों में गूँज रहीं, मंत्रों की मधुर ध्वनियाँ,  बलिदान के इस युग में, तू गूंध नई कड़ियाँ,  अब तो प्रभु के आगे, नीची गर्दन कर ले।। इक बार भजन कर ले ...................... .. 

कर्मों की जंजीर न तोड़ी, प्यार प्रभु का तोड़ दिया। मोहमाया में अंधा बनकर, पाप से नाता जोड़ लिया।

 कर्मों की जंजीर न तोड़ी, प्यार प्रभु का तोड़ दिया।  मोहमाया में अंधा बनकर, पाप से नाता जोड़ लिया। कर्मों की जंजीर न तोड़ी................................ आया था तू इस दुनिया में, जीवन ज्योति जलाने को,  तजकर आया झूठे धंधे, प्रभु के दर्शन पाने को।  पर पग तेरे नहीं उठते हैं, प्रभु के दर तक जाने को।  प्रभु भक्ति को दिल से भुलाकर, सच्चा रास्ता छोड़ दिया।।1।। कर्मों की जंजीर न तोड़ी................................ गई जवानी आया बुढ़ापा, अब क्यों बैठा रोता है,  बीत गई सो जाने दे अब, शेष बची क्यों खोता है। सफल है जग में जीवन उसका, धर्म के बीज जो बोता है,  गंदे कर्मों में फँसकर, अनमोल जन्म क्यों खो दिया।।2।। कर्मों की जंजीर न तोड़ी................................ शाम-सवेरे हरदम दिल में, रहती तेरे माया है,  सोना-चाँदी देख-देखकर, डोली तेरी काया है। मोह अज्ञान का घोर अँधेरा, तेरे तन पर छाया है,  होके दीवाना इस दुनिया में, प्रभु से मुखड़ा मोड़ लिया।।3।। कर्मों की जंजीर न तोड़ी................................

मुझे तूने मालिक बहुत कुछ दिया है। तेरा शुक्रिया है, तेरा शुक्रिया है।।

  मुझे तूने मालिक बहुत कुछ दिया है।  तेरा शुक्रिया है, तेरा शुक्रिया है।। मुझे तूने मालिक .................... ना मिलती अगर दी हुई दात तेरी,  तो क्या थी जमाने में औकात मेरी,  यह बन्दा तो तेरे सहारे जिया है।। तेरा शुक्रिया है....................  यह जायदाद दी है ये औलाद दी है,  मुसीबत में हर वक्त इमदाद की है,  तेरा ही दिया मैंने खाया पिया है।। तेरा शुक्रिया है तेरा .................... मेरा ही नहीं है, सभी का तू दाता  सभी को सभी कुछ है देता दिलाता  जो खाली था दामन, वह तूने भरा है तेरा शुक्रिया है तेरा .................... मेरा भूल जाना तेरा ना भूलाना,  तेरी रहमतों का कहाँ है ठिकाना,  तेरी इस मोहब्बत ने पागल किया है।। तेरा शुक्रिया है तेरा .................... तेरी बन्दगी से मैं बन्दा हूँ मालिक,  तेरे ही करम से मैं जिन्दा हूँ मालिक,  तुम्हीं ने तो जीने के काबिल किया है।। तेरा शुक्रिया है तेरा....................

वेदों में, ईश्वर को *दयालु एवं न्यायकारी* कहा गया है ।

 वेदों में, ईश्वर को *दयालु एवं न्यायकारी* कहा गया है । ईश्वर दयालु इसलिए है कि वे प्रत्येक उस व्यक्ति को उसके द्वारा किये गये पाप कर्म का दण्ड अवश्य देते हैं, जिससे वह व्यक्ति आगे उस पाप कर्म को न करे ।  इसे दयालुता ही तो कहेगें, नहीं तो पापी व्यक्ति को दण्ड ना मिले तो दिन-प्रतिदिन बड़े से बड़ा पाप करने में वह सलंग्न रहेगा, जिससे की सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था नष्ट हो जायेगी ।  और न्यायकारी इसलिए कहा गया है कि किसी को भी उतना ही दण्ड मिलता है, जितने उसने पाप किया है | आज कुछ अज्ञानियों ने ईश्वर की न्याय व्यवस्था को न समझ कर शनि की मूर्ति पर तेल चढ़ाने से पापों का क्षमा होना प्रचारित कर दिया है । यह ना केवल ईश्वर की कर्म फल व्यवस्था का अपमान है, अपितु अपने आपको भी मुर्खता के घोर अंधकार में रखने के समान है । तेल चढ़ाने से ना तो कोई पाप कर्म क्षमा होता है, और ना ही अपने द्वारा किये गये पापों के कारण मिलने वाले दण्ड से मनुष्य बच पाता है । आप अपनी तर्कशील बुद्धि का प्रयोग कर स्वयं निर्णय करें कि वे सत्य का वरण करना चाहेगें, अथवा असत्य का वरण करना चाहेगें । और यही सत्यार्थ प्रकाश का...

ईश्वर का सत्ता

 *ईश्वर का सत्ता* "श्रदस्मै धत्त स जनास इन्द्रः  |"            (ऋ० २/१२/५)            हे मनुष्यो ! इस परमेश्वर पर श्रद्धा करो वह परमैश्वर्यवान प्रभु है । नास्तिक वैज्ञानिक कहते हैं,  ईश्वर की सिद्धि प्रयोगशाला में हो, तो हम ईश्वर के सत्ता को मानने को तैयार हैं अन्यथा नहीं । इनकी यह धारणा ठीक नहीं ।ईश्वर सृष्टि और शरीररुपी प्रयोगशाला में सिद्ध होता है । महर्षि दयानन्द जी ने सत्यार्थ प्रकाश में लिखते हैं, इन्द्रियों और मन से गुणों का प्रत्यक्ष होता है गुणी का नहीं । पांचों इन्द्रियों से स्पर्श, रुप, रस, गन्ध का ज्ञान होने से गुणी जो पृथ्वी है, उसका आत्मायुक्त मन से प्रत्यक्ष किया जाता है, वैसे इस प्रत्यक्ष सृष्टि की रचना विशेष में ज्ञानादि गुणों के प्रत्यक्ष होने से परमेश्वर का भी प्रत्यक्ष है । शरीर की अद्भुत रचना को देखकर ईश्वर की सत्ता का प्रत्यक्ष होता है । *संसार परमात्मा में स्थित है।* श्वेतकेतु की समझ में नहीं आ रहा था कि यह नाना रुपों वाला जगत मात्र एक ही तत्व 'सत' से किस प्रकार उत्पन्न हो सकता है ।  उ...

ईश्वर के गुण

 *ईश्वर के गुण* १) वह चेतन दिव्य शक्ति परमेश्वर एक ही है । अर्थात कोई दूसरा उसके तुल्य वा अधिक नहीं । २) वह द्रष्टा है, और सब जगत में परिपूर्ण होकर जड़ तथा चेतन दोनों प्रकार के जगत को देखता है, उसका कोई द्रष्टा (अध्यक्ष) नहीं और वह स्वयं किसी का दृश्य भी नहीं हो सकता है । ३) वह सर्वज्ञ है, अर्थात् सब कुछ जानता है, और उसका ज्ञान संसार की सब वस्तुओं से प्रकट होता है । ४) वह सर्वव्यापक है, अर्थात सूक्ष्म से सूक्ष्म और महान् पदार्थ के अन्दर और बाहर ओत-प्रोत है । वह इस ब्रह्माण्ड में पूर्ण (सर्वत्र व्याप्त) हो रहा है । वह सूक्ष्मतर से भी सूक्ष्मतम और महत्तर से भी महत्तम है । इससे कोई सूक्ष्म तथा बड़ी वस्तु न तो है, न होगी और न थी । ५) वह स्वयं स्थिर है । जैसे एक वृक्ष शाखा, पत्र तथा पुष्पादिकों को धारण करता है, उसी प्रकार परमेश्वर पृथ्वी, सूर्यादि समस्त जगत को धारण करता हुआ, उसमें व्यापक होकर ठहरा हुआ है । जैसे आकाश के बीच में सब पदार्थ रहते हैं, परन्तु आकाश सबसे अलग रहता है, अर्थात किसी से बंधता नहीं, इसी प्रकार परमेश्वर को भी जानना चाहिये । ६) वह सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान है, क्योंकि उ...

ईश्वर विषय

 *ईश्वर विषय* # ईश्वर का मुख्य नाम         ‘ओ३म्’ है । # ईश्वर के असंख्य गौणिक नाम हैं । जिससे हमें उसके गुण, कर्म और स्वभाव का पता चलता है । # ईश्वर एक ही है, उसके नाम अनेक हैं । # ईश्वर कभी जन्म नहीं लेता ।          वह अजन्मा है । # स्तुति, प्रार्थना, उपासना मात्र ईश्वर की ही करनी चाहिये ।  # ईश्वर से अधिक सामर्थ्यशाली और कोई नहीं है ।          वह सर्वशक्तिमान है । # जिसमें सबसे अधिक ऐश्वर्य होता है, उसे इन्द्र कहते हैं, अर्थात ‘इन्द्र’ ईश्वर का नाम है । # दुःख तीन प्रकार के होते हैं -  आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक दुःख । # अविद्या, राग-द्वेष, रोग इत्यादि से होने वाले दुःख को,  आध्यात्मिक दुःख कहते हैं ।  # मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट-पतंग, मक्खी-मच्छर, सांप इत्यादि से होने वाले दुःख को,  आधिभौतिक दुःख कहते हैं । # अधिक सर्दी, गर्मी, वर्षा, भूख, प्यास, मन की अशान्ति से होने वाले दुःख को,  आधिदैविक दुःख कहते हैं । # विष्णु, वरुण, परमात्मा, पिता, ब्रह्मा, महादेव, महेश, सरस्वती, शिव, गणे...

वैदिक विचार

 *वैदिक विचार*    *पूजा* किसी वस्तु का सम्मान कर, उससे यथायोग्य लाभ लेना, पूजा है । *ईश्वर पूजा* ईश्वर के उपदेशों का पालन कर ज्ञान व आनन्द लेना, ही ईश्वर की पूजा अथवा ईश्वरभक्ति करना कहलाता है । *ईश्वरभक्ति की विधि* ईश्वर के तुल्य अपने गुण, कर्म, स्वभाव को बनाना । *ईश्वरभक्ति के लाभ* आत्मबल की प्राप्ति, पूर्ण सुखशांति व ईश्वर की प्राप्ति । ईश्वर की मूर्ति पर *फल-फूल का चढ़ावा* नहीं, मूर्ति जड़ है । ईश्वर चेतन व निराकार है उस पर फल, फूल जलादि नहीं चढ़ा सकते हैं ।  *ईश्वर की मूर्ति में प्राणप्रतिष्ठा* यह प्राणप्रतिष्ठा नहीं, पाखंड प्रतिष्ठा है, क्योंकि प्राणप्रतिष्ठा के बाद भी मूर्ति जीवित और चेतन नहीं होती है ।  ईश्वर का सही स्वरूप जानने के लिए मूर्तिपूजा ठीक नहीं है | बच्चों को शुरु में २×८= १६ सिखाते हैं, अथवा २×८ = ८ । तब गणित के समान विद्या-विज्ञान के दाता ईश्वर के स्वरूप को ही ठीक न सीखना व सिखाना महापाप, महाअन्याय है । ईश्वर कण-कण में है । जड़ मूर्ति में ईश्वर के समान ज्ञान, बल व सर्वज्ञता आदि गुण नहीं है ।  *अवतार* कहते हैं, उतरने को । सर्वव्यापक होने...

ईश्वर का स्वरुप

 *ईश्वर का स्वरुप*  "अजो न क्षां दाधार पृथिवीं तस्तम्भ द्यां मन्त्रेभिः सत्यैः । प्रिया पदानि पश्वो निपाहि विश्वायुरग्ने गुहा गुहं गाः ।।"         (ऋ० १/६७/३)        जैसे अज अर्थात न जन्म लेने वाला अजन्मा परमेश्वर न टूटने वाले विचारों से पृथिवी को धारण करता है, विस्तृत अन्तरिक्ष तथा द्यौलोक को रोके हुए है, प्रीतिकारक पदार्थों को देता है, सम्पूर्ण आयु देने वाला, बंधन से सर्वथा छुड़ाता है, बुद्धि में स्थित हुआ वह गोप्य पदार्थ को जानता है, वैसे तू भी हे विद्वान जीव! हमें प्राप्तव्य की प्राप्ति करा । "प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा विजायते ।  तस्य योनि परिपश्यन्ति धीरास्तस्मिन् ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा ।।"       (यजु० ३१/१९)       अपने स्वरुप से उत्पन्न न होने वाला अजन्मा परमेश्वर, गर्भस्थ जीवात्मा और सबके ह्रदय में विचरता है और उसके स्वरुप को धीर लोग सब और देखते हैं ।उसमें सब लोक लोकान्तर स्थित है । "ब्रह्म वा अजः ।"       (शतपथ० ६/४/४/१५)       ब्रह्म ही अजन्मा है । उप...

ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति विषयक आर्यसमाज के सिद्धान्त

 ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति विषयक आर्यसमाज के सिद्धान्त ईश्वर १) ईश्वर एक है व उसका मुख्य नाम 'ओ३म्' है । अपने विभिन्न गुण-कर्म-स्वभाव के कारण वह अनेक नामों से जाना जाता है । २) ईश्वर 'निराकार' है अर्थात् उसकी कोई मूर्त्ति नहीं है और न बन सकती है, न ही उसका कोई लिङ्ग या निशान है । ३)  ईश्वर 'अनादि, अजन्मा और अमर' है । वह न कभी पैदा होता है और न कभी मरता है । ४) ईश्वर 'सच्चिदानन्दस्वरूप' है, अर्थात्  सदैव आनन्दमय रहता है, कभी क्रोधित नहीं होता । ५) जीवों को उसके कर्मानुसार यथायोग्य न्याय देने हेतु वह 'न्यायकारी' कहलाता है । यदि ईश्वर जीवों को उसके कुकर्मों का दण्ड न दे, तो इससे वह अन्यायकारी सिद्ध हो जायेगा । ६) ईश्वर 'न्यायकारी' होने के साथ-साथ 'दयालु' भी है, अर्थात् वह जीवों को दण्ड इसलिए देता है कि जिससे जीव अपराध करने से बन्ध होकर दुःखों का भागी न बने, यही ईश्वर की दया है । ७) कण-कण में व्याप्त होने से वह 'सर्वव्यापक' है, अर्थात वह प्रत्येक स्थान पर उपस्थित है । ८) ईश्वर को किसी का भय नहीं होता, इससे वह 'अभय' है ...