जीवात्माओं वा मनुष्यों के शरीरों की आकृति व सामर्थ्य में भेद का कारण”
ओ३म् “जीवात्माओं वा मनुष्यों के शरीरों की आकृति व सामर्थ्य में भेद का कारण” ========== जीवात्मा जन्म-मरणधर्मा है। ईश्वर की व्यवस्था से इसे अपने पूर्वजन्मों के कर्मानुसार जाति, आयु व भोग प्राप्त होते हैं। इन तीनों कार्यों को प्राप्त करने में यह परतन्त्र है। जीव मनुष्य योनि में जन्म लेने के बाद कर्म करने में तो स्वतन्त्र है परन्तु उनके फल इसे ईश्वर की व्यवस्था से मिलते हैं जिसमें यह परतन्त्र होता है। यह भी ज्ञातव्य है कि मनुष्य योनि उभय योनि होती है। इस योनि में मनुष्य स्वतन्त्रतापूर्वक कर्म करता है और अपने पूर्व किये हुए कर्मों के फलों को भोगता भी है। फलों के भोग में यह परतन्त्र होता है। मनुष्य से इतर सभी योनियां केवल भोग योनियां होती है। इन योनियों में जीवात्मा अपने पूर्वजन्म के कर्मों के फलों का भोग ही करता है। पशु आदि भोग योनियों में वह अपनी बुद्धि से सोच कर कोई धर्म व परमार्थ का कार्य नहीं कर सकता। उसके सभी भोग, अर्थात् सुख और दुःख, ईश्वर से निर्धारित होते हैं। इन भोग योनियों में हमारी मनुष्य योनि की जीवात्मा को भी परजन्म लेकर दुःख न उठाने पड़े, इसीलिये मनुष्य योनि में हमें सत्य...