सत्याचरण ही सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है

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  ।।सत्याचरण ही सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है।। आचार्य श्री प्रेम आर्य, वैदिक पुरोहित, गया जी, 9304366018 ओ३म् व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्।            दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धाया सत्यमाप्यते।।                                          य०अ०- १९,मं०-३०  भावार्थ-           (व्रतेन) जो मनुष्य सत्य के आचरण को दृढ़ता से करता है, तब वह दीक्षा अर्थात उत्तम अधिकार के फल को प्राप्त करता है।(दीक्षयाप्नोति०) जब मनुष्य उत्तम गुणों से युक्त होता है, तब सब लोग सब प्रकार से उसका सत्कार करते हैं। क्योंकि धर्म आदि शुभ गुणों से ही उस दक्षिणा को मनुष्य प्राप्त होता है, अन्यथा नहीं।(दक्षिणा श्र०) जब ब्रह्मचर्य आदि सत्यव्रतों से अपना और दूसरे मनुष्यों का अत्यंत सत्कार होता है, तब उसी में दृढ़ विश्वास होता है। क्योंकि सत्य धर्म का आचरण ही मनुष्यों का सत्कार करने वाला है।(श्रद्धया) फिर सत्य के आचरण में जितनी जितनी अधिक ...

प्रभु तेरी भक्ति का वर मांगते हैं। झुके तेरे दर पे वो सर मांगते हैं।।

 प्रभु तेरी भक्ति का वर मांगते हैं।

 झुके तेरे दर पे वो सर मांगते हैं।।

बुरे भाव से जो न देखे किसी को।

 हम आँखों में ऐसी नजर मांगते हैं।।

प्रभु तेरी भक्ति का...........


पड़े अगर मुसीबत न झोली पसारें।

हम हाथों में ऐसा हुनर मांगते हैं।। 

पुकारे कोई दीन अबला हमें गर। 

घड़ी पल में पहुँचे वो वर मांगते हैं।।

प्रभु तेरी भक्ति का.............


जो बेताब जुल्म और सितम देखकर हो। 

तड़पता हुआ वो जिगर मांगते हैं।। 

दुःखी या अनाथों की सेवा हो जिससे । 

प्रभु अपने घर ऐसा जर मांगते हैं।।

प्रभु तेरी भक्ति का.............

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