धर्म किसे कहते है ?

धर्म किसे कहते है ?       जिस प्रकार प्राणों के बिना मनुष्य जीवित नहीं रह सकता, उसी प्रकार धर्म (नैतिक आचरण) के बिना मनुष्य का भी कोई महत्त्व नहीं।      धर्म आचरण की वस्तु है।धर्म केवल प्रवचन और वाद-विवाद का विषय नहीं।केवल तर्क-वितर्क में उलझे रहना धार्मिक होने का लक्षण नहीं है।धार्मिक होने का प्रमाण यही है कि व्यक्ति का धर्म पर कितना आचरण है। व्यक्ति जितना-जितना धर्म पर आचरण करता है उतना-उतना ही वह धार्मिक बनता है।'धृ धारणे' से धर्म शब्द बनता है, जिसका अर्थ है धारण करना। धर्म किसी संगठित लोगों के समुह का नाम नही न ही अभिमान व गर्व करने की वस्तु है ।        धर्म मनुष्य में शिवत्व /पवित्रता की स्थापना करना चाहता है।वह मनुष्य को पशुता के धरातल से ऊपर उठाकर मानवता की और ले जाता है और मानवता के ऊपर उठाकर उसे देवत्व की और ले-जाता है।यदि कोई व्यक्ति धार्मिक होने का दावा करता है और मनुष्यता और देवत्व उसके जीवन में नहीं आ पाते, तो समझिए कि वह धर्म का आचरण न करके धर्म का आडम्बर कर रहा है।     मनु महाराज के अनुसार धर्म की महिमा   ...

मिलता है सच्चा सुख, भगवान् तुम्हारे चरणों में।

 मिलता है सच्चा सुख, भगवान् तुम्हारे चरणों में। 

यह विनती है पल-पल छिन-छिन, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में।।1।।

मिलता है सच्चा सुख भगवान् ..................


चाहे वैरी कुल संसार बने, चाहे जीवन मुझ पर भार बने। 

चाहे मौत गले का हार बने, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में।।2।।

मिलता है सच्चा सुख भगवान् ...............


चाहे कष्टों ने मुझे घेरा हो, चाहे चारों ओर अंधेरा हो।

पर चित्त न डगमगा मेरा हो, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में।।3।।

मिलता है सच्चा सुख भगवान्.................


मेरी जिह्वा पर तेरा नाम रहे, तेरी याद सुबह और शाम रहे। 

बस काम यह आठों याम रहे, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में।।4।।

मिलता है सच्चा सुख भगवान्..................


चाहे कांटों में मुझे चलना हो, चाहे अग्नि में मुझे जलना हो। 

चाहे छोड़ के देश निकलना हो, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में।।5।।

मिलता है सच्चा सुख भगवान्.......................

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