धर्म किसे कहते है ?

धर्म किसे कहते है ?       जिस प्रकार प्राणों के बिना मनुष्य जीवित नहीं रह सकता, उसी प्रकार धर्म (नैतिक आचरण) के बिना मनुष्य का भी कोई महत्त्व नहीं।      धर्म आचरण की वस्तु है।धर्म केवल प्रवचन और वाद-विवाद का विषय नहीं।केवल तर्क-वितर्क में उलझे रहना धार्मिक होने का लक्षण नहीं है।धार्मिक होने का प्रमाण यही है कि व्यक्ति का धर्म पर कितना आचरण है। व्यक्ति जितना-जितना धर्म पर आचरण करता है उतना-उतना ही वह धार्मिक बनता है।'धृ धारणे' से धर्म शब्द बनता है, जिसका अर्थ है धारण करना। धर्म किसी संगठित लोगों के समुह का नाम नही न ही अभिमान व गर्व करने की वस्तु है ।        धर्म मनुष्य में शिवत्व /पवित्रता की स्थापना करना चाहता है।वह मनुष्य को पशुता के धरातल से ऊपर उठाकर मानवता की और ले जाता है और मानवता के ऊपर उठाकर उसे देवत्व की और ले-जाता है।यदि कोई व्यक्ति धार्मिक होने का दावा करता है और मनुष्यता और देवत्व उसके जीवन में नहीं आ पाते, तो समझिए कि वह धर्म का आचरण न करके धर्म का आडम्बर कर रहा है।     मनु महाराज के अनुसार धर्म की महिमा   ...

प्रभु सारी दुनियाँ से, ऊँची तेरी शान है। कितना महान् है तू, कितना महान है।।

 प्रभु सारी दुनियाँ से, ऊँची तेरी शान है।

 कितना महान् है तू, कितना महान है।।


यहाँ वहाँ कोने कोने, तू ही मशहूर है।

 निकट से निकट और, दूर से भी दूर है।

 तुझमें समाया हुआ, सकल जहान है।।

प्रभु सारी दुनियाँ से ऊँची................


तू ही एक मालिक है, सारी कायनात का।

फूलों भरी क्यारियों का, तारों की जमात का।

 तेरी ही जमीन है ये, तेरा आसमान है।।

प्रभु सारी दुनियाँ से ऊँची...............


सबने जो रंग देखे, सभी तेरे रंग हैं। 

जग में अनेक तेरे, पालन के ढंग हैं। 

तुझको तो छोटे बड़े, सबका ही ध्यान है।।

प्रभु सारी दुनियाँ से ऊँची..................


जितने भी दुनियाँ में, जीव देहधारी है। 

सभी तेरे प्यार के, समान अधिकारी हैं।

 'पथिक' सभी को तूने, दिया वरदान है।।


प्रभु सारी दुनियाँ से, ऊँची तेरी शान है।

कितना महान् है तू, कितना महान है।।





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