संदेश

धर्म किसे कहते है ?

धर्म किसे कहते है ?       जिस प्रकार प्राणों के बिना मनुष्य जीवित नहीं रह सकता, उसी प्रकार धर्म (नैतिक आचरण) के बिना मनुष्य का भी कोई महत्त्व नहीं।      धर्म आचरण की वस्तु है।धर्म केवल प्रवचन और वाद-विवाद का विषय नहीं।केवल तर्क-वितर्क में उलझे रहना धार्मिक होने का लक्षण नहीं है।धार्मिक होने का प्रमाण यही है कि व्यक्ति का धर्म पर कितना आचरण है। व्यक्ति जितना-जितना धर्म पर आचरण करता है उतना-उतना ही वह धार्मिक बनता है।'धृ धारणे' से धर्म शब्द बनता है, जिसका अर्थ है धारण करना। धर्म किसी संगठित लोगों के समुह का नाम नही न ही अभिमान व गर्व करने की वस्तु है ।        धर्म मनुष्य में शिवत्व /पवित्रता की स्थापना करना चाहता है।वह मनुष्य को पशुता के धरातल से ऊपर उठाकर मानवता की और ले जाता है और मानवता के ऊपर उठाकर उसे देवत्व की और ले-जाता है।यदि कोई व्यक्ति धार्मिक होने का दावा करता है और मनुष्यता और देवत्व उसके जीवन में नहीं आ पाते, तो समझिए कि वह धर्म का आचरण न करके धर्म का आडम्बर कर रहा है।     मनु महाराज के अनुसार धर्म की महिमा   ...

मनचाही संतान* की परमौषधि है - *"ब्रह्मचर्य

चित्र
  *"मनचाही संतान* की परमौषधि है - *"ब्रह्मचर्य"*  यदि मनचाही सन्तान चाहते हैं, तो मन, वचन और शरीर से सर्वावस्था में ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें । ब्रह्मचर्य ही वह औषधि है, जिसके पालन से कुल की संस्कार तथा राष्ट्रोन्नति के योग्य सन्तानों को जन्म दिया जा सकता है |   ब्रह्मचर्य से ही मनुष्यों में दिव्य गुणों को निर्माण होता है | मनवाञ्छित सन्तान प्राप्ति के लिए योगेश्वर श्रीकृष्ण एक अद्वितीय उदाहरण हैं | वेद कहता है - "मनुर्भव जनया दैव्यं जनम ।"          अर्थात् मनुष्य बनो । "मननातिति मनुष्यः ।"           विचार कर विवेक से कर्म करने के कारण मनुष्य कहाता है । और दिव्य अर्थात् उत्तमोत्तम गुणों को प्राप्त करें तथा उत्तरोत्तर गुणों से युक्त सन्तानों को जन्म दें ।  परन्तु, यह भी ध्यान रखें । "जो दिव्य गुणों से हीन, असंयमी, व्यभिचारी अर्थात् ब्रह्मचर्यहीन सन्तानों को जन्म देते हैं, वह स्वयं ही लम्पट, अजितेन्द्रिय, वासना के कामी कीडे़ और पशुओं से भी निकृष्ट होते हैं, उनकी सन्तानें, सन्तानें नहीं अपितु एक दुर्घटना होती है ...

वर्ण-व्यवस्था के लाभ गुण-कर्म-स्वभावानुसार,

 *वर्ण-व्यवस्था के लाभ* गुण-कर्म-स्वभावानुसार,  वर्ण-व्यवस्था होने से सब वर्ण अपने-अपने गुण-कर्म और स्वभाव से युक्त होकर शुद्धता के साथ रहते हैं | वर्ण-व्यवस्था के ठीक परिपालन होने से ब्राह्मण के कुल में ऐसा कोई व्यक्ति न रह सकेगा जो कि क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र वाले गुण-कर्म-स्वभाववाला का हो | इसी प्रकार अन्य वर्ण अर्थात क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र भी अपने शूद्ध स्वरूप में रहेगें, वर्णसंकरता नहीं होगी | गुण-कर्मानुसार वर्ण-व्यवस्था में किसी वर्ण की निन्दा या अयोग्यता का भी अवसर नहीं रहता | ऐसी अवस्था रखने से मनुष्य उन्नतिशील होता है, क्योंकि उत्तम वर्णों को भय होगा कि यदि हमारी सन्तान मुर्खत्वादि दोषयुक्त होगी तो वह शूद्र हो जायेगी और सन्तान भी डरती रहेगी कि यदि हम उक्त चाल-चलनवाले और विद्यायुक्त न होगें तो हमें शूद्र होना पड़ेगा | गुण-कर्मानुसार वर्ण-व्यवस्था होने से नीच वर्णों का उत्तम वर्णस्थ होने के लिये उत्साह बढ़ता है | गुण-कर्मों से वर्णों की यह व्यवस्था कन्याओं की सोलहवें और पुरुषों की पच्चीसवें वर्ष की परीक्षा में नियत करनी चाहिये और इसी क्रम से अर्थात ब्राह्मण का ब्राह्मण...

लक्ष्मण रेखा....

 लक्ष्मण रेखा.... लक्ष्मण रेखा आप सभी जानते हैं पर इसका असली नाम शायद नहीं पता होगा । लक्ष्मण रेखा का नाम (सोमतिती विद्या है)  यह भारत की प्राचीन विद्याओ में से जिसका अंतिम प्रयोग महाभारत युद्ध में हुआ था  चलिए जानते हैं अपने प्राचीन भारतीय विद्या को सोमतिती विद्या लक्ष्मण रेखा.. महर्षि श्रृंगी कहते हैं कि एक वेदमन्त्र है--सोमंब्रही वृत्तं रत: स्वाहा वेतु सम्भव ब्रहे वाचम प्रवाणम अग्नं ब्रहे रेत: अवस्ति,, यह वेदमंत्र कोड है उस सोमना कृतिक यंत्र का,, पृथ्वी और बृहस्पति के मध्य कहीं अंतरिक्ष में वह केंद्र है जहां यंत्र को स्थित किया जाता है,, वह यंत्र जल,वायु और अग्नि के परमाणुओं को अपने अंदर सोखता है,, कोड को उल्टा कर देने पर एक खास प्रकार से अग्नि और विद्युत के परमाणुओं को वापस बाहर की तरफ धकेलता है,, जब महर्षि भारद्वाज ऋषिमुनियों के साथ भृमण करते हुए वशिष्ठ आश्रम पहुंचे तो उन्होंने महर्षि वशिष्ठ से पूछा--राजकुमारों की शिक्षा दीक्षा कहाँ तक पहुंची है??महर्षि वशिष्ठ ने कहा कि यह जो ब्रह्मचारी राम है-इसने आग्नेयास्त्र वरुणास्त्र ब्रह्मास्त्र का संधान करना सीख लिया है,, ...

आजादी का सच

 गीत -आजादी का सच ( तर्ज: अपनी आजादी को हम हरगिज़ भुला सकते नहीं )  आर्यों की कुर्बानी को हम , हरगिज़ भुला सकते नहीं । आजादी का सच कहेंगे, सच छुपा सकते नहीं।। सच छुपा सकते नहीं।। १. बाद सन सत्तावन के जब, भारत में उदासी छाई थी फिरंगियों की कूटनीति से, हमने मुंह की खाई थी तब दयानंद स्वामी ने गौरव जगाया देश का हुंकार स्वदेशी स्वराज की सबसे पहले लगाई थी। ये अटल वो सत्य है,जिसको झुठा सकते नहीं।। आजादी का सच कहेंगे ---- २. आजादी के आंदोलन का जब, सच बताया जाएगा  सबसे ज्यादा आर्य थे, जेलों में जिक्र आएगा करते रहे संध्या उपदेश,सहकर के कष्ट जेल में ये कटु वो सत्य है जिसे,जेलर ना भूल पाएगा।  नेहरू मोहानी रिपोर्ट, हम भुला सकते नही।। आजादी का सच ------ ३. परमानन्द महावीर पहुंचे काला पानी में होतीलाल पृथ्वी सिंह सड़ गए काला पानी में  जोते गये कोल्हू में जयदेव और नंद गोपाल, सेलुलर में आहुति दी,रामरखा बाली ने  हैं अमिट ये नाम, हम ये नाम मिटा सकते नहीं।। आजादी का सच--------- ४. बिस्मिल रोशन चढ गये, फांसी भरी जवानी में कोई कसर छोड़ी नहीं, गोरों ने मनमानी में  लाजपत ने ख...

मिलता है सच्चा सुख, भगवान् तुम्हारे चरणों में।

चित्र
 मिलता है सच्चा सुख, भगवान् तुम्हारे चरणों में।  यह विनती है पल-पल छिन-छिन, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में।।1।। मिलता है सच्चा सुख भगवान् .................. चाहे वैरी कुल संसार बने, चाहे जीवन मुझ पर भार बने।  चाहे मौत गले का हार बने, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में।।2।। मिलता है सच्चा सुख भगवान् ............... चाहे कष्टों ने मुझे घेरा हो, चाहे चारों ओर अंधेरा हो। पर चित्त न डगमगा मेरा हो, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में।।3।। मिलता है सच्चा सुख भगवान्................. मेरी जिह्वा पर तेरा नाम रहे, तेरी याद सुबह और शाम रहे।  बस काम यह आठों याम रहे, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में।।4।। मिलता है सच्चा सुख भगवान्.................. चाहे कांटों में मुझे चलना हो, चाहे अग्नि में मुझे जलना हो।  चाहे छोड़ के देश निकलना हो, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में।।5।। मिलता है सच्चा सुख भगवान्.......................

ओ३म् नाम के हीरे मोती मैं बिखराऊँ गली गली ले लो रे कोई ओ३म् का प्यारा

ओ३म् नाम के हीरे मोती मैं बिखराऊँ गली गली  ले लो रे कोई ओ३म् का प्यारा  आवाज लगाऊँ गली-गली  ओ३म् नाम के हीरे मोती मैं बिखराऊँ गली गली  माया के दीवानों सुन लो  इक दिन ऐसा आयेगा  धन दौलत और रूप खजाना  यहीं धरा रह जायेगा  सुन्दर काया माटी होगी  चर्चा होगी गली-गली  ओ३म् नाम के हीरे मोती मैं बिखराऊँ गली गली  मित्र-प्यारे और सगे-सम्बन्धी  एक दिन भूल जायेंगे  कहते हैं जो अपना-अपना  आग में तुझे जलायेंगे  दो दिन का ये चमन खिला है  फिर मुरझाए कली-कली  ओ३म् नाम के हीरे मोती मैं बिखराऊँ गली गली  क्यों करता है मेरी-तेरी  तज दे उस  अभिमान को  छोड़ जगत् के झूठे धन्धे  जप ले प्रभु के नाम को  गया समय फिर हाथ न आये  तब पछताये घड़ी धड़ी  ओ३म् नाम के हीरे मोती मैं बिखराऊँ गली गली  जिसको अपना कह-कह के  मूरख तू इतराता है  छोड़ के बन्दे साथ विपत्त/विपद् में  कभी न कोई जाता है  दो दिन का ये रैन-बसेरा  आखिर होगी चला चली   ओ३म् नाम के हीरे मोती मैं बिखरा...

प्रभु सारी दुनियाँ से, ऊँची तेरी शान है। कितना महान् है तू, कितना महान है।।

 प्रभु सारी दुनियाँ से, ऊँची तेरी शान है।  कितना महान् है तू, कितना महान है।। यहाँ वहाँ कोने कोने, तू ही मशहूर है।  निकट से निकट और, दूर से भी दूर है।  तुझमें समाया हुआ, सकल जहान है।। प्रभु सारी दुनियाँ से ऊँची................ तू ही एक मालिक है, सारी कायनात का। फूलों भरी क्यारियों का, तारों की जमात का।  तेरी ही जमीन है ये, तेरा आसमान है।। प्रभु सारी दुनियाँ से ऊँची............... सबने जो रंग देखे, सभी तेरे रंग हैं।  जग में अनेक तेरे, पालन के ढंग हैं।  तुझको तो छोटे बड़े, सबका ही ध्यान है।। प्रभु सारी दुनियाँ से ऊँची.................. जितने भी दुनियाँ में, जीव देहधारी है।  सभी तेरे प्यार के, समान अधिकारी हैं।  'पथिक' सभी को तूने, दिया वरदान है।। प्रभु सारी दुनियाँ से, ऊँची तेरी शान है। कितना महान् है तू, कितना महान है।।

डूबतों को बचा लेने वाले, मेरी नैया है तेरे हवाले।

डूबतों को बचा लेने वाले, मेरी नैया है तेरे हवाले। लाख अपनों को मैंने पुकारा, सबके सब कर गए हैं किनारा।  और देता न कोई दिखाई, सिर्फ तेरा ही अब तो सहारा।  कौन तुझ बिन भँवर से निकाले। मेरी नैया है तेरे हवाले..……....... जिस समय तू बचाने पे आए, आग में भी बचा कर दिखाए।  जिस पर तेरी दया दृष्टि होवे, उसपे कैसे कहीं आँच आए।  आँधियों में भी तू ही सँभाले ।  मेरी नैया है तेरे हवाले....….............. पृथ्वी सागर व पर्वत बनाए, तूने धरती पे दरिया बहाए।  चाँद सूरज करोड़ों सितारे, फूल आकाश में भी खिलाए।  तेरे सब काम जग से निराले।  मेरी नैया है तेरे हवाले.............. बिन तेरे चैन मिलता नहीं है, फूल आशा का खिलता नहीं है।  तेरी मर्जी बिना तो जहाँ में, 'पथिक' पत्ता भी हिलता नहीं है।  तेरे वश में अंधेरे उजाले ।। मेरी नैया है तेरे हवाले..................

प्रभु तेरी भक्ति का वर मांगते हैं। झुके तेरे दर पे वो सर मांगते हैं।।

 प्रभु तेरी भक्ति का वर मांगते हैं।  झुके तेरे दर पे वो सर मांगते हैं।। बुरे भाव से जो न देखे किसी को।  हम आँखों में ऐसी नजर मांगते हैं।। प्रभु तेरी भक्ति का........... पड़े अगर मुसीबत न झोली पसारें। हम हाथों में ऐसा हुनर मांगते हैं।।  पुकारे कोई दीन अबला हमें गर।  घड़ी पल में पहुँचे वो वर मांगते हैं।। प्रभु तेरी भक्ति का............. जो बेताब जुल्म और सितम देखकर हो।  तड़पता हुआ वो जिगर मांगते हैं।।  दुःखी या अनाथों की सेवा हो जिससे ।  प्रभु अपने घर ऐसा जर मांगते हैं।। प्रभु तेरी भक्ति का.............

प्रभु जी इतनी सी दया कर दो, हमको भी तुम्हारा प्यार मिले

  प्रार्थना प्रभु जी इतनी सी दया कर दो, हमको भी तुम्हारा प्यार मिले। कुछ और भले ही मिले न मिले, प्रभु दर्शन का अधिकार मिले । । 1 ।। जिस जीवन में जीवन ही नहीं, वह जीवन भी क्या जीवन है। जीवन तब जीवन बनता है, जब जीवन का आधार मिले।।2।। प्रभु जी इतनी सी दया कर दो...................... सब कुछ पाया इस जीवन में, बस एक तमन्ना बाकी है। हर प्रेम पुजारी के अपने, मन मंदिर में दातार मिले।।3।। प्रभु जी इतनी सी दया कर दो............. जिसने तुमसे जो कुछ मांगा, उसने ही वही तुम से पाया।  दुनिया को मिले दुनिया लेकिन, भक्तों को तेरा दरबार मिले।।4।। प्रभु जी इतनी सी दया कर दो.......... हम जन्म जन्म के प्यासे हैं, और तुम करुणा के सागर हो। करुणानिधि से करुणा रस की, एक बूँद हमें इक बार मिले। ।5।। प्रभु जी इतनी सी दया कर दो.............. कब से प्रभु दर्शन पाने की, हम आस लगाए बैठे हैं। पल दो पल भीतर आने की, अनुमति अनुपम सरकार मिले। ।6।। प्रभु जी इतनी सी दया कर दो.......... इस मार्ग पर चलते-चलते, सदियाँ ही नहीं युग बीत गए। मिल जाए 'पथिक' मंजिल अपनी, हमको भी तुम्हारा द्वार मिले। ।7।। प्रभु जी इतनी सी दया ...