सत्याचरण ही सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है

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  ।।सत्याचरण ही सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है।। आचार्य श्री प्रेम आर्य, वैदिक पुरोहित, गया जी, 9304366018 ओ३म् व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्।            दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धाया सत्यमाप्यते।।                                          य०अ०- १९,मं०-३०  भावार्थ-           (व्रतेन) जो मनुष्य सत्य के आचरण को दृढ़ता से करता है, तब वह दीक्षा अर्थात उत्तम अधिकार के फल को प्राप्त करता है।(दीक्षयाप्नोति०) जब मनुष्य उत्तम गुणों से युक्त होता है, तब सब लोग सब प्रकार से उसका सत्कार करते हैं। क्योंकि धर्म आदि शुभ गुणों से ही उस दक्षिणा को मनुष्य प्राप्त होता है, अन्यथा नहीं।(दक्षिणा श्र०) जब ब्रह्मचर्य आदि सत्यव्रतों से अपना और दूसरे मनुष्यों का अत्यंत सत्कार होता है, तब उसी में दृढ़ विश्वास होता है। क्योंकि सत्य धर्म का आचरण ही मनुष्यों का सत्कार करने वाला है।(श्रद्धया) फिर सत्य के आचरण में जितनी जितनी अधिक ...

रामसेतु निर्माण:


*रामसेतु निर्माण:*

क्या इसमें कहीं तैरने वाले पत्थरों का जिक्र आया?





नल: मैं महासागरपर पुल बाँधनेमें समर्थ हूँ, अतः सब वानर आज ही पुल बाँधनेका कार्य आरम्भ कर दें' ॥ ५३ ॥


तब भगवान् श्रीरामके भेजनेसे लाखों बड़े-बड़े वानर हर्ष और उत्साहमें भरकर सब ओर उछलते हुए गये और बड़े-बड़े जंगलों में घुस गये ॥ ५४ ॥


वे पर्वतके समान विशालकाय वानरशिरोमणि पर्वतशिखरों और वृक्षों को तोड़ देते और उन्हें समुद्रnतक खींच लाते थे ॥ ५५


वे साल, अश्वकर्ण, धव, बाँस, कुटज, अर्जुन, ताल, तिलक, तिनिश, बेल, छितवन, खिले हुए कनेर, आम और अशोक आदि वृक्षोंसे समुद्रको पाटने लगे ॥ ५६-५७ ॥


वे श्रेष्ठ वानर वहाँ के वृक्षों को जड़से उखाड़ लाते या जड़ के ऊपर से भी तोड़ लाते थे। इन्द्रध्वजके समान ऊँचे- ऊँचे वृक्षोंको उठाये लिये चले आते थे ॥ ५८ ॥





ताड़ों, अनारकी झाड़ियों, नारियल और बहेड़ेके वृक्षों, करीर, बकुल तथा नीमको भी इधर-उधरसे तोड़-तोड़कर लाने लगे ॥ ५९ ॥

महाकाय महाबली वानर हाथीके समान बड़ी-बड़ी शिलाओं और पर्वतोंको उखाड़कर यन्त्रों (विभित्र साधनों) द्वारा समुद्रतटपर से आते थे ॥ ६० ॥


शिलाखण्डोंको फेंकनेसे समुद्रका जल सहसा आकाशमें उठ जाता और फिर वहाँसे नीचेको गिर जाता था ॥ ६१ ॥


उन वानरो ने सब ओर पत्थर गिराकर समुद्रमें हलचल मचा दी। कुछ दूसरे वानर सौ योजन लंबा सूत पकड़े हुए थे ॥ ६२ ॥


नल नदों और नदियोंके स्वामी समुद्रके बीचमे महान् सेतुका निर्माण कर रहे थे। भयंकर कर्म करनेवाले वानरोने मिल-जुलकर उस समय सेतुनिर्माणका कार्य आरम्भ किया था ॥ ६३ ॥


कोई नापनेके लिये दण्ड पकड़ते थे तो कोई सामग्री जुटाते थे। श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा शिरोधार्य करके सैकड़ों वानर जो पर्वतों और मेघोंके समान प्रतीत होते थे, वहाँ तिनकों और काष्ठोद्वारा भिन्न-भिन्न स्थानोंमें पुल बाँध रहे थे। जिनके अग्रभाग फूलोंसे लदे थे, ऐसे वृक्षोंद्वारा भी वे वानर सेतु बाँधते थे ॥ ६४-६५ ॥


पर्वतों-जैसी बड़ी-बड़ी चट्टाने और पर्वत-शिखर लेकर सब ओर दौड़ते वानर दानवोंके समान दिखायी देते थे ॥ ६६ ॥


उस समय उस महासागरमे फेंकी जाती हुई शिलाओं और गिराये जाते हुए पहाड़ोंके गिरनेसे बड़ा भीषण शब्द हो रहा था ॥ ६७ ॥


हाथीके समान विशालकाय वानर बड़े उत्साह और तेजीके साथ काममें लगे हुए थे। पहले दिन उन्होंने चौदह योजन लंबा पुल बाँधा ॥ ६८ ॥


फिर दूसरे दिन भयंकर शरीरवाले महाबली वानरोंने तेजीसे काम करके बीस योजन लंबा पुल बाँध दिया ॥ ६९ ॥


तीसरे दिन शीघ्रतापूर्वक काममें जुटे हुए महाकाय कपियोंने समुद्रमें इक्कीस योजन लंबा पुल बाँध दिया ॥ ७० ॥


चौथे दिन महान् वेगशाली और शीघ्रकारी वानरोंने बाईस योजन लंबा पुल और बाँध दिया ॥ ७१ ॥





तथा पाँचवें दिन शीघ्रता करनेवाले उन वानर वीरोंने सुवेल पर्वतके निकटतक तेईस योजन लंबा पुल बाँधा ॥ ७२ ॥ •


इस प्रकार विश्वकर्माकै बलवान् पुत्र कान्तिमान् कपिश्रेष्ठ नल ने समुद्रमें सौ योजन लंबा पुल तैयार कर दिया। इस कार्यमें वे अपने पिताके समान ही प्रतिभाशाली थे ॥ ७३ ॥


मकरालय समुद्रमें नलके द्वारा निर्मित हुआ वह सुन्दर और शोभाशाली सेतु आकाशमें स्वातीपथ (छायापथ) के समान सुशोभित होता था।


उस समय कार्यको देखनेके लिये आकाश आकर नलके बनाये हुए सौ योजन लेबे और दस योजन रहते उस पुलको देवताओं और गंधर्वों ने देखा, जिसे बनाना बहुत ही कठिन काम था ॥ ७६ ॥


वानरलोग भी इधर-उधर उछल-कूदकर गर्जना करते हुए उस अधिन्य, असा, अद्भुत और रोमाञ्चकारी पुलको देख रहे थे। समस्त प्राणियोंने ही समुद्रमें सेतु बाँधनेका वह कार्य देखा ॥ ७७॥


इस प्रकार उन सहस्र कोटि (एक खरव) महाबली एवं उत्साही वानरीका दल पुल बाँधते बाँचते ही समुद्रके उस पार पहुँच गया ॥ ७८३ ॥


वह पुल बढ़ा ही विशाल, सुन्दरतासे बनाया हुआ, शोभासम्पत्र, समतल और सुसम्बद्ध था। वह महान् सेतु सागरमें सीमन्तके समान शोभा पाता था ॥ ७९ ॥


पुल तैयार हो जानेपर अपने सचिवोंके साथ विभीषण गदा हाथमें लेकर समुद्रके दूसरे तटपर खड़े हो गये, जिससे शत्रुपक्षीय राक्षस यदि पुल तोड़नेके लिये आवें तो उन्हें दण्ड दिया जा सके ॥ ८०३ ॥


 तदनन्तर सुग्रीवने सत्यपराक्रमी श्रीरामसे कहा- वीरवर! आप हनुमान्‌के कंधेपर चढ़ जाइये और लक्ष्मण 'अङ्गदकी पीठपर सवार हो लें, क्योंकि यह मकरालय समुद्र बहुत लंबा-चौड़ा है। ये दोनों वानर आकाश-मार्गसे चलनेवाले हैं। अतः ये ही दोनों आप दोनों भाइयोंको धारण कर सकेंगे ॥८१-८२३ ॥


इस प्रकार धनुर्धर एवं धर्मात्मा भगवान् श्रीराम लक्ष्मण और सुग्रीवके साथ उस सेनाके आगे-आगे चले ॥ ८३३ ॥


दूसरे वानर सेनाके बीचमें और अगल-बगलमें होकर चलने लगे। कितने ही वानर जलमें कूद पड़ते और तैरते हुए चलते थे। दूसरे पुलका मार्ग पकड़कर जाते थे और कितने ही आकाशमें उछलकर गरुड़के समान उड़ते थे ॥ ८४-८५॥


इस प्रकार पार जाती हुई उस भयंकर वानर सेनाने अपने महान् घोषसे समुद्रकी बढ़ी हुई भीषण गर्जनाको भी दबा दिया ॥ ८६ ॥


धरि-धीरे वानरोंकी सारी सेना नलके बनाये हुए पुलसे समुद्रके उस पार पहुँच गयी। राजा सुग्रीवने फल, मूल और जलकी अधिकता देख सागरके तटपर ही सेनाका पड़ाव डाला ॥ ८७ ॥


भगवान् श्रीरामका वह अद्भुत और दुष्कर कर्म देखकर सिद्ध, चारण और महर्षियोंके साथ देवतालोग उनके पास आये तथा उन्होंने अलग-अलग पवित्र एवं शुभ जलसे उनका अभिषेक किया ॥ ८८ ॥


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