सत्याचरण ही सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है

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  ।।सत्याचरण ही सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है।। आचार्य श्री प्रेम आर्य, वैदिक पुरोहित, गया जी, 9304366018 ओ३म् व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्।            दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धाया सत्यमाप्यते।।                                          य०अ०- १९,मं०-३०  भावार्थ-           (व्रतेन) जो मनुष्य सत्य के आचरण को दृढ़ता से करता है, तब वह दीक्षा अर्थात उत्तम अधिकार के फल को प्राप्त करता है।(दीक्षयाप्नोति०) जब मनुष्य उत्तम गुणों से युक्त होता है, तब सब लोग सब प्रकार से उसका सत्कार करते हैं। क्योंकि धर्म आदि शुभ गुणों से ही उस दक्षिणा को मनुष्य प्राप्त होता है, अन्यथा नहीं।(दक्षिणा श्र०) जब ब्रह्मचर्य आदि सत्यव्रतों से अपना और दूसरे मनुष्यों का अत्यंत सत्कार होता है, तब उसी में दृढ़ विश्वास होता है। क्योंकि सत्य धर्म का आचरण ही मनुष्यों का सत्कार करने वाला है।(श्रद्धया) फिर सत्य के आचरण में जितनी जितनी अधिक ...

वैदिक सन्ध्या

 वैदिक सन्ध्या


ओ३म्‌ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।

धियो यो नः प्रचोदयात्‌ ॥

-यजु. ३६.३


ओ३म्‌ शन्नो देवीरभिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये।

शंयोरभि स्रवन्तु नः॥

-यजु. ३६.१२

(दाहिने हाथ में जल लेकर तीन बार आचमन करें)


ओं वाक्‌ वाक्‌। ओं प्राणः प्राणः। ओं चक्षुः चक्षुः। ओं श्रोत्रं श्रोत्रम्‌। ओं नाभिः।

ओं हृदयम्‌। ओं कण्ठः। ओं शिरः। ओं बाहुभ्यां यशोबलम्‌। ओं करतलकरपृष्ठे॥

(इन्द्रिय स्पर्श करें)


ओं भूः पुनातु शिरसि। ओं भुवः पुनातु नेत्रयोः। ओं स्वः पुनातु कण्ठे।

ओं महः पुनातु हृदये । ओं जनः पुनातु नाभ्याम्‌। ओं तपः पुनातु पादयोः।

ओं सत्यम्‌ पुनातु पुनश्शिरसि। ओं खं ब्रह्म पुनातु सर्वत्र॥

(जल से मार्जन करें)


ओं भूः। ओं भुवः। ओं स्वः। ओं महः। ओं जनः। ओं तपः। ओं सत्यम्‌॥

(प्राणायाम करें)


ओं ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत।

ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः॥


समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत।

अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी॥


सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्‌।

दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः॥

-ऋग्‌. १०.१९०.१-३


ओ३म्‌ शन्नो देवीरभिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये।

शंयोरभि स्रवन्तु नः॥

-यजु. ३६.१२

(दाहिने हाथ में जल लेकर तीन बार आचमन करें)


ओं प्राची दिगग्निरधिपतिरसितो रक्षितादित्या इषवः।

तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।

यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः॥


ओं दक्षिणा दिगिन्द्रोऽधिपतिस्तिरश्चिराजी रक्षिता पितर इषवः।

तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।

यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः॥


ओं प्रतीची दिग्वरुणोऽधिपतिः पृदाकू रक्षितान्नमिषवः।

तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।

यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः॥


ओं उदीची दिक्सोमोेऽधिपतिः स्वजो रक्षिताशनिरिषवः।

तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।

यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः॥


ओं ध्रुवा दिग्विष्णुरधिपतिः कल्माषग्रीवो रक्षिता वीरुध इषवः।

तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।

यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः॥


ओं ऊर्ध्वा दिग्बृहस्पतिरधिपतिः श्वित्रो रक्षिता वर्षमिषवः।

तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।

यो३स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः॥

-अथर्व.३.२७.१-६


ओम्‌ उद्वयं तमसस्परि स्वः पश्यन्तऽउत्तरम्‌।

देवं देवत्रा सूर्य्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्‌॥

-यजु. ३५.१४


उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः।

दृशे विश्वाय सूर्य्यम्‌॥

-यजु. ३३.३१


चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः।

आप्रा द्यावापृथिवीऽअन्तरिक्षम्‌

सूर्यऽआत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा॥

-यजु. ७.४२


तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्‌।

पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं

शृणुयाम शरदः शतं प्र ब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं

भूयश्च शरदः शतात्‌॥

-यजु. ३६.२४


ओ३म्‌ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।

धियो यो नः प्रचोदयात्‌ ॥

-यजु. ३६.३


हे ईश्वर दयानिधे ! भवत्कृपयानेन जपोपासनादिकर्मणा

धर्मार्थकाममोक्षाणां सद्यः सिद्धिर्भवेन्नः॥


ओं नमः शम्भवाय च मयोभवाय च

नमः शंकराय च मयस्कराय च

नमः शिवाय च शिवतराय च॥

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