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प्रभु सारी दुनियाँ से ऊँची तेरी शान है। कितना महान् है तू कितना महान् है।

 ईश महिमा प्रभु सारी दुनियाँ से ऊँची तेरी शान है।  कितना महान् है तू कितना महान् है। यहाँ वहाँ कोने-कोने तू ही मशहूर है।  निकट से निकट और दूर से भी दूर है।  'तुझमें समाया हुआ सकल जहान है।' कितना महान् है तू कितना महान् है ...... तू ही एक मालिक है सारी कायनात का।  फूलों भरी क्यारियों का तारों की जमात का।  तेरी ही जमीन है यह तेरा आसमान है। कितना महान् है तू कितना महान् है. सबने जो रंक देखे सभी तेरे रंग हैं।  जग में अनेक तेरे पालने के ढंग हैं।  तुझको तो छोटे-बड़े सबका ही ध्यान है। कितना महान् है तू कितना महान् है. जितने भी दुनियाँ में जीव देहधारी हैं।  सभी तेरे प्यार के समान अधिकारी हैं।  'पथिक' सभी को दिया तूने वरदान है। कितना महान् है तू कितना महान् है

ईश्वर विषय

 *ईश्वर विषय* # ईश्वर का मुख्य नाम         ‘ओ३म्’ है । # ईश्वर के असंख्य गौणिक नाम हैं । जिससे हमें उसके गुण, कर्म और स्वभाव का पता चलता है । # ईश्वर एक ही है, उसके नाम अनेक हैं । # ईश्वर कभी जन्म नहीं लेता ।          वह अजन्मा है । # स्तुति, प्रार्थना, उपासना मात्र ईश्वर की ही करनी चाहिये ।  # ईश्वर से अधिक सामर्थ्यशाली और कोई नहीं है ।          वह सर्वशक्तिमान है । # जिसमें सबसे अधिक ऐश्वर्य होता है, उसे इन्द्र कहते हैं, अर्थात ‘इन्द्र’ ईश्वर का नाम है । # दुःख तीन प्रकार के होते हैं -  आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक दुःख । # अविद्या, राग-द्वेष, रोग इत्यादि से होने वाले दुःख को,  आध्यात्मिक दुःख कहते हैं ।  # मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट-पतंग, मक्खी-मच्छर, सांप इत्यादि से होने वाले दुःख को,  आधिभौतिक दुःख कहते हैं । # अधिक सर्दी, गर्मी, वर्षा, भूख, प्यास, मन की अशान्ति से होने वाले दुःख को,  आधिदैविक दुःख कहते हैं । # विष्णु, वरुण, परमात्मा, पिता, ब्रह्मा, महादेव, महेश, सरस्वती, शिव, गणे...

वैदिक विचार

 *वैदिक विचार*    *पूजा* किसी वस्तु का सम्मान कर, उससे यथायोग्य लाभ लेना, पूजा है । *ईश्वर पूजा* ईश्वर के उपदेशों का पालन कर ज्ञान व आनन्द लेना, ही ईश्वर की पूजा अथवा ईश्वरभक्ति करना कहलाता है । *ईश्वरभक्ति की विधि* ईश्वर के तुल्य अपने गुण, कर्म, स्वभाव को बनाना । *ईश्वरभक्ति के लाभ* आत्मबल की प्राप्ति, पूर्ण सुखशांति व ईश्वर की प्राप्ति । ईश्वर की मूर्ति पर *फल-फूल का चढ़ावा* नहीं, मूर्ति जड़ है । ईश्वर चेतन व निराकार है उस पर फल, फूल जलादि नहीं चढ़ा सकते हैं ।  *ईश्वर की मूर्ति में प्राणप्रतिष्ठा* यह प्राणप्रतिष्ठा नहीं, पाखंड प्रतिष्ठा है, क्योंकि प्राणप्रतिष्ठा के बाद भी मूर्ति जीवित और चेतन नहीं होती है ।  ईश्वर का सही स्वरूप जानने के लिए मूर्तिपूजा ठीक नहीं है | बच्चों को शुरु में २×८= १६ सिखाते हैं, अथवा २×८ = ८ । तब गणित के समान विद्या-विज्ञान के दाता ईश्वर के स्वरूप को ही ठीक न सीखना व सिखाना महापाप, महाअन्याय है । ईश्वर कण-कण में है । जड़ मूर्ति में ईश्वर के समान ज्ञान, बल व सर्वज्ञता आदि गुण नहीं है ।  *अवतार* कहते हैं, उतरने को । सर्वव्यापक होने...

ईश्वर का स्वरुप

 *ईश्वर का स्वरुप*  "अजो न क्षां दाधार पृथिवीं तस्तम्भ द्यां मन्त्रेभिः सत्यैः । प्रिया पदानि पश्वो निपाहि विश्वायुरग्ने गुहा गुहं गाः ।।"         (ऋ० १/६७/३)        जैसे अज अर्थात न जन्म लेने वाला अजन्मा परमेश्वर न टूटने वाले विचारों से पृथिवी को धारण करता है, विस्तृत अन्तरिक्ष तथा द्यौलोक को रोके हुए है, प्रीतिकारक पदार्थों को देता है, सम्पूर्ण आयु देने वाला, बंधन से सर्वथा छुड़ाता है, बुद्धि में स्थित हुआ वह गोप्य पदार्थ को जानता है, वैसे तू भी हे विद्वान जीव! हमें प्राप्तव्य की प्राप्ति करा । "प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा विजायते ।  तस्य योनि परिपश्यन्ति धीरास्तस्मिन् ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा ।।"       (यजु० ३१/१९)       अपने स्वरुप से उत्पन्न न होने वाला अजन्मा परमेश्वर, गर्भस्थ जीवात्मा और सबके ह्रदय में विचरता है और उसके स्वरुप को धीर लोग सब और देखते हैं ।उसमें सब लोक लोकान्तर स्थित है । "ब्रह्म वा अजः ।"       (शतपथ० ६/४/४/१५)       ब्रह्म ही अजन्मा है । उप...

ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति विषयक आर्यसमाज के सिद्धान्त

 ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति विषयक आर्यसमाज के सिद्धान्त ईश्वर १) ईश्वर एक है व उसका मुख्य नाम 'ओ३म्' है । अपने विभिन्न गुण-कर्म-स्वभाव के कारण वह अनेक नामों से जाना जाता है । २) ईश्वर 'निराकार' है अर्थात् उसकी कोई मूर्त्ति नहीं है और न बन सकती है, न ही उसका कोई लिङ्ग या निशान है । ३)  ईश्वर 'अनादि, अजन्मा और अमर' है । वह न कभी पैदा होता है और न कभी मरता है । ४) ईश्वर 'सच्चिदानन्दस्वरूप' है, अर्थात्  सदैव आनन्दमय रहता है, कभी क्रोधित नहीं होता । ५) जीवों को उसके कर्मानुसार यथायोग्य न्याय देने हेतु वह 'न्यायकारी' कहलाता है । यदि ईश्वर जीवों को उसके कुकर्मों का दण्ड न दे, तो इससे वह अन्यायकारी सिद्ध हो जायेगा । ६) ईश्वर 'न्यायकारी' होने के साथ-साथ 'दयालु' भी है, अर्थात् वह जीवों को दण्ड इसलिए देता है कि जिससे जीव अपराध करने से बन्ध होकर दुःखों का भागी न बने, यही ईश्वर की दया है । ७) कण-कण में व्याप्त होने से वह 'सर्वव्यापक' है, अर्थात वह प्रत्येक स्थान पर उपस्थित है । ८) ईश्वर को किसी का भय नहीं होता, इससे वह 'अभय' है ...

ईश्वर का शुक्रिया :- करने के लिए निम्नलिखित कारण है :-

*ईश्वर का शुक्रिया :- करने के लिए निम्नलिखित कारण है :-* 1. *टायर चलने पर घिसते हैं, लेकिन पैर के तलवे जीवनभर दौड़ने के बाद भी नए जैसे रहते हैं।*   2. *शरीर 75% पानी से बना है, फिर भी लाखों रोमकूपों के बावजूद एक बूंद भी लीक नहीं होती।*   3. *कोई भी वस्तु बिना सहारे नहीं खड़ी रह सकती, लेकिन यह शरीर खुद को संतुलित रखता है।*   4. *कोई बैटरी बिना चार्जिंग के नहीं चलती, लेकिन हृदय जन्म से लेकर मृत्यु तक बिना रुके धड़कता है।* 5. *कोई पंप हमेशा नहीं चल सकता, लेकिन रक्त पूरे जीवनभर बिना रुके शरीर में बहता रहता है।*   6. *दुनिया के सबसे महंगे कैमरे भी सीमित हैं, लेकिन आंखें हजारों मेगापिक्सल की गुणवत्ता में हर दृश्य कैद कर सकती हैं।*   7. *कोई लैब हर स्वाद टेस्ट नहीं कर सकती, लेकिन जीभ बिना किसी उपकरण के हजारों स्वाद पहचान सकती है।*   8. *सबसे एडवांस्ड सेंसर भी सीमित होते हैं, लेकिन त्वचा हर हल्की-से-हल्की संवेदना को महसूस कर सकती है।*   9. *कोई भी यंत्र हर ध्वनि नहीं निकाल सकता, लेकिन कंठ से हजारों फ्रीक्वेंसी की आवाजें पैदा ...

जाने भारतीय संस्कृति का प्रतीक -वैदिक धर्म का आधार यज्ञोपवीत/ जनेऊ सभी स्त्री पुरूष -युवक युवतियाँ क्यों धारण करें ?

 जाने भारतीय संस्कृति का प्रतीक -वैदिक धर्म का आधार यज्ञोपवीत/ जनेऊ सभी स्त्री पुरूष -युवक युवतियाँ क्यों धारण करें ? यज्ञोपवीत भारतीय संस्कृति का प्रतीक है। यह यज्ञ की वेश-भूषा है। यह विद्या का चिह्न है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, हनुमान जी,योगिराज श्रीकृष्ण, महाराज शिव, ब्रह्मा जी, ब्रह्मवादिनी गार्गी, भगवती सीता सती-साध्वी द्रौपदी आदि सभी नर-नारी यज्ञोपवीत धारण करते थे। यज्ञोपवीत में तीन तार-धागे होते हैं। तीनों तारों का सन्देश है- मनुष्य पर तीन ऋण चढ़े हुए हैं- देवऋण, ऋषि-ऋण, पितृ-ऋण। इन तीनों ऋणों से उऋण होना होता है।  देव ऋण :- यज्ञ करो, परमेश्वर की उपासना करो।  ऋषि ऋण :- विद्वानों का सत्कार करो, वेद का स्वाध्याय करो,  पितृ-ऋण:- माता-पिता की सेवा करो अचार्य गुरू का सत्कार करो  इस प्रकार इन ऋणों से उऋण होंगे। तीन अनादि पदार्थ हैं- ईश्वर, जीव, प्रकृति। इन तीनों को जानें।  ईश्वर का और हमारा क्या सम्बन्ध है? उसे कैसे पाया जा सकता है। मैं कौन हूँ? कहॉं से आया हूँ? मुझे कहॉं जाना है? इन बातों का चिन्तन करें। संसार क्या है? हम इस गोरखधन्धे में कैसे फंस गये? ...

अंधविश्वास : किसी भी जीव की हत्या करना पाप है, किन्तु मक्खी, मच्छर, कीड़े मकोड़े को मारने में कोई पाप नही होता ।

अंधविश्वास  :  किसी भी जीव की हत्या करना पाप है, किन्तु मक्खी, मच्छर, कीड़े मकोड़े को मारने में कोई पाप नही होता ।     निर्मुलन  :  हत्या करना पाप है  -- बिलकुल ठीक है, किन्तु जो दुष्कर्म करता है,और जो मनुष्य  - जाति के लिए हानिकारक है उसे सरकार भी फाँसी की सज़ा सुनाती है। उचित तो यह है कि मक्खी  - मच्छरों को घर में आने से रोकने के उपाय करने चाहिए, मक्खी  - मच्छरों को घर में आने से रोका जा सकता है, अगर फिर भी जो मच्छर, जीव-जन्तु हानि पहुचाते है उनको मारना ही उचित है। क्योंकि सब योनियो में मनुष्य योनि सर्वश्रेष्ठ है, इसकी रक्षा करना मनुष्य का परम कर्तव्य है।जिससे भी मनुष्य को अपने प्राणों का खतरा है उसको मार डालने में कोई आपत्ति नहीं है। अगर कोई मनुष्य भी मनुष्य जाति के लिए खतरा बन जाता है तो, उसे भी मार डालने में कोई पाप नही है ।       महाभारत में एक श्लोक के द्वारा समझाते हुए कहा गया है कि --       " अहिंसा परमो धर्म, धर्म हिंसा तदैव च। " अर्थात अहिंसा मनुष्य का परम धर्म है। किन्तु धर्म की रक्षा के लिए हिंस...

धर्म किसे कहते है ?

धर्म किसे कहते है ?       जिस प्रकार प्राणों के बिना मनुष्य जीवित नहीं रह सकता, उसी प्रकार धर्म (नैतिक आचरण) के बिना मनुष्य का भी कोई महत्त्व नहीं।      धर्म आचरण की वस्तु है।धर्म केवल प्रवचन और वाद-विवाद का विषय नहीं।केवल तर्क-वितर्क में उलझे रहना धार्मिक होने का लक्षण नहीं है।धार्मिक होने का प्रमाण यही है कि व्यक्ति का धर्म पर कितना आचरण है। व्यक्ति जितना-जितना धर्म पर आचरण करता है उतना-उतना ही वह धार्मिक बनता है।'धृ धारणे' से धर्म शब्द बनता है, जिसका अर्थ है धारण करना। धर्म किसी संगठित लोगों के समुह का नाम नही न ही अभिमान व गर्व करने की वस्तु है ।        धर्म मनुष्य में शिवत्व /पवित्रता की स्थापना करना चाहता है।वह मनुष्य को पशुता के धरातल से ऊपर उठाकर मानवता की और ले जाता है और मानवता के ऊपर उठाकर उसे देवत्व की और ले-जाता है।यदि कोई व्यक्ति धार्मिक होने का दावा करता है और मनुष्यता और देवत्व उसके जीवन में नहीं आ पाते, तो समझिए कि वह धर्म का आचरण न करके धर्म का आडम्बर कर रहा है।     मनु महाराज के अनुसार धर्म की महिमा   ...

सत्याचरण ही सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है

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  ।।सत्याचरण ही सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है।। आचार्य श्री प्रेम आर्य, वैदिक पुरोहित, गया जी, 9304366018 ओ३म् व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्।            दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धाया सत्यमाप्यते।।                                          य०अ०- १९,मं०-३०  भावार्थ-           (व्रतेन) जो मनुष्य सत्य के आचरण को दृढ़ता से करता है, तब वह दीक्षा अर्थात उत्तम अधिकार के फल को प्राप्त करता है।(दीक्षयाप्नोति०) जब मनुष्य उत्तम गुणों से युक्त होता है, तब सब लोग सब प्रकार से उसका सत्कार करते हैं। क्योंकि धर्म आदि शुभ गुणों से ही उस दक्षिणा को मनुष्य प्राप्त होता है, अन्यथा नहीं।(दक्षिणा श्र०) जब ब्रह्मचर्य आदि सत्यव्रतों से अपना और दूसरे मनुष्यों का अत्यंत सत्कार होता है, तब उसी में दृढ़ विश्वास होता है। क्योंकि सत्य धर्म का आचरण ही मनुष्यों का सत्कार करने वाला है।(श्रद्धया) फिर सत्य के आचरण में जितनी जितनी अधिक ...

धर्म क्या है ?

  धर्म क्या है ?  =============    धर्म वह है जो मनुष्य मात्र का कल्याण करने में समर्थ हो,किसी व्यक्ति या वर्ग विषेश का नहीं।        धर्म वह है जो जीवन के सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त करे।बौद्धिक,आत्मिक,शारीरिक,सामाजिक,राष्ट्रीय उन्नति के लिए प्रेरणा दे;जिसमें समानता,एकता,परस्पर प्रेम,सौहार्द,सद्भावना,समदृष्टि उत्पन्न करने की क्षमता हो;जो कर्तव्य पालन के प्रति सचेत करे।ऐसे धर्म को धारण करके मनुष्य का इहलोक भी सुधर सकता है और परलोक भी।       धर्म के प्रति यह दार्शनिक दृष्टिकोण कितना उदात्त व विशाल है।       यतोअभ्युदयनि: श्रेयसस्सिद्धि स धर्म: ।     जिससे लौकिक और पारलौकिक उन्नति हो,वही धर्म है।       पारलौकिक उन्नति से अभिप्राय आत्मिक और पारमार्थिक उन्नति है,अर्थात् केवल भौतिक उन्नति ही जीवन के लिए आवश्यक नहीं है अपितु आत्मिक उन्नति की आवश्यकता उससे भी कहीं अधिक है।         भौतिक उन्नति शरीर के लिए है और आत्मिक उन्नति आत्मा के लिए है।दोनों प्रकार की उन्नति ही मनुष्य के ...