प्रभु सारी दुनियाँ से ऊँची तेरी शान है। कितना महान् है तू कितना महान् है।

 ईश महिमा प्रभु सारी दुनियाँ से ऊँची तेरी शान है।  कितना महान् है तू कितना महान् है। यहाँ वहाँ कोने-कोने तू ही मशहूर है।  निकट से निकट और दूर से भी दूर है।  'तुझमें समाया हुआ सकल जहान है।' कितना महान् है तू कितना महान् है ...... तू ही एक मालिक है सारी कायनात का।  फूलों भरी क्यारियों का तारों की जमात का।  तेरी ही जमीन है यह तेरा आसमान है। कितना महान् है तू कितना महान् है. सबने जो रंक देखे सभी तेरे रंग हैं।  जग में अनेक तेरे पालने के ढंग हैं।  तुझको तो छोटे-बड़े सबका ही ध्यान है। कितना महान् है तू कितना महान् है. जितने भी दुनियाँ में जीव देहधारी हैं।  सभी तेरे प्यार के समान अधिकारी हैं।  'पथिक' सभी को दिया तूने वरदान है। कितना महान् है तू कितना महान् है

कब हमारा मन सन्ध्या और उपासना में लगने लगेगा

 *कब हमारा मन सन्ध्या और उपासना में लगने लगेगा ?*

लोग पूछा करते हैं कि हमने मान तो लिया कि ईश्वर का अस्तित्व है, ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव अनन्त हैं, उसके नाम भी अनन्त हैं । परन्तु क्या बात है कि हमारा मन ईश्वर की पूजा में नहीं लगता है, पूजा के समय मन भागता क्यों है, मन को हम वश में कैसे करें ? मन अपने वश में नहीं रहता, यह शिकायत सबको है, सबकी परेशानी सच्ची है । आपकी भी यह कठिनाई है, और बड़े-बड़े संन्यासियों और योगियों की भी । हम संध्या करने बैठते हैं, और जबान से तो सन्ध्या के सारे मन्त्र पढ़ जाते हैं, मन्त्र तो पढ़े जाते हैं, परन्तु मन कहीं और विचर रहे होते हैं । ऐसा क्यों होता है ? इसके सोचने का हमें प्रयत्न करना चाहिये ।

सन्ध्या के समय आपका मन भागता है, यह बात तो सच्ची है, परन्तु जब आप शतरंज का खेल खेलते हैं, ताश खेलते हैं, तो मन क्यों नहीं भागता है ? क्रिकेट की कमेण्टरी सुनने के लिए भीड़ क्यों उतावली रहती है ? टेस्टमैच देखने में मन क्यों लगता है ? सिनेमा और सरकस के समय मन क्यों नहीं भागता है ?

मैं जब बच्चा था, तब गणित में मन नहीं लगता था, पर जब लगने लगा, तो अंकगणित या रेखागणित में घण्टों व्यस्त रहने लगा । ऐसा क्यों हुआ ? मन लगाने के लिए रस पैदा करना पड़ता है, रस पैदा हो गया तो मन साथ देता है । संसार भर के प्यार के प्रति हमने रस पैदा किया है, पर प्रभु के प्यार का रस नहीं मिला । इसीलिए मन सन्ध्या के समय भागता है । जिसे ईश्वर के प्यार का रस नहीं मिला, उसे तो सन्ध्या रूखी लगेगी ही, जबरदस्ती तो मन नहीं लगाया जा सकता है । सन्ध्या करने का ढोंग तो रच सकते हैं, पर वह जबरदस्ती की चीज नहीं है । आरम्भ में मन भागेगा, धीरे-धीरे इसका अभ्यास करो, जैसे गणित का, संगीत का, दर्शन शास्त्र का अभ्यास डाला जाता है । व्याकरण रूखा विषय है, भाषाशास्त्र भी रूखा विषय है । पर अभ्यास से रस स्वतः उत्पन्न हो जाता है । प्रभु के प्यार के लिए भी धीरे-धीरे तप, अभ्यास और अन्य आकर्षणों और प्रलोभनों के प्रति वैराग्य इन भोगों से हमें आगे बढ़ना पड़ेगा । जन्मना रुचि तो भाग्यवानों की ही होती है । अनेक पिछले जन्मों के संस्कारों से यह वैराग्य बुद्ध, दयानन्द, शंकराचार्य और थोड़े-से विरलों में ही था । शेष साधारण लोगों को धीरे-धीरे इस ओर अपने चरण आगे बढ़ाने पड़ेगें । ईश्वर के प्यार में जब तुम्हारी आंखें कभी-कभी डबडबाने लगे, अथवा ओठों पर मुसकान आने लगे, तो समझना कि ईश्वर की बातों में तुम्हें रस आने लगा है । और तब हमारा मन सन्ध्या और उपासना में भी लगने लगेगा ।

     .......  स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती ।

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