ईश्वर का शुक्रिया :- करने के लिए निम्नलिखित कारण है :-

*ईश्वर का शुक्रिया :- करने के लिए निम्नलिखित कारण है :-* 1. *टायर चलने पर घिसते हैं, लेकिन पैर के तलवे जीवनभर दौड़ने के बाद भी नए जैसे रहते हैं।*   2. *शरीर 75% पानी से बना है, फिर भी लाखों रोमकूपों के बावजूद एक बूंद भी लीक नहीं होती।*   3. *कोई भी वस्तु बिना सहारे नहीं खड़ी रह सकती, लेकिन यह शरीर खुद को संतुलित रखता है।*   4. *कोई बैटरी बिना चार्जिंग के नहीं चलती, लेकिन हृदय जन्म से लेकर मृत्यु तक बिना रुके धड़कता है।* 5. *कोई पंप हमेशा नहीं चल सकता, लेकिन रक्त पूरे जीवनभर बिना रुके शरीर में बहता रहता है।*   6. *दुनिया के सबसे महंगे कैमरे भी सीमित हैं, लेकिन आंखें हजारों मेगापिक्सल की गुणवत्ता में हर दृश्य कैद कर सकती हैं।*   7. *कोई लैब हर स्वाद टेस्ट नहीं कर सकती, लेकिन जीभ बिना किसी उपकरण के हजारों स्वाद पहचान सकती है।*   8. *सबसे एडवांस्ड सेंसर भी सीमित होते हैं, लेकिन त्वचा हर हल्की-से-हल्की संवेदना को महसूस कर सकती है।*   9. *कोई भी यंत्र हर ध्वनि नहीं निकाल सकता, लेकिन कंठ से हजारों फ्रीक्वेंसी की आवाजें पैदा ...

कब हमारा मन सन्ध्या और उपासना में लगने लगेगा

 *कब हमारा मन सन्ध्या और उपासना में लगने लगेगा ?*

लोग पूछा करते हैं कि हमने मान तो लिया कि ईश्वर का अस्तित्व है, ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव अनन्त हैं, उसके नाम भी अनन्त हैं । परन्तु क्या बात है कि हमारा मन ईश्वर की पूजा में नहीं लगता है, पूजा के समय मन भागता क्यों है, मन को हम वश में कैसे करें ? मन अपने वश में नहीं रहता, यह शिकायत सबको है, सबकी परेशानी सच्ची है । आपकी भी यह कठिनाई है, और बड़े-बड़े संन्यासियों और योगियों की भी । हम संध्या करने बैठते हैं, और जबान से तो सन्ध्या के सारे मन्त्र पढ़ जाते हैं, मन्त्र तो पढ़े जाते हैं, परन्तु मन कहीं और विचर रहे होते हैं । ऐसा क्यों होता है ? इसके सोचने का हमें प्रयत्न करना चाहिये ।

सन्ध्या के समय आपका मन भागता है, यह बात तो सच्ची है, परन्तु जब आप शतरंज का खेल खेलते हैं, ताश खेलते हैं, तो मन क्यों नहीं भागता है ? क्रिकेट की कमेण्टरी सुनने के लिए भीड़ क्यों उतावली रहती है ? टेस्टमैच देखने में मन क्यों लगता है ? सिनेमा और सरकस के समय मन क्यों नहीं भागता है ?

मैं जब बच्चा था, तब गणित में मन नहीं लगता था, पर जब लगने लगा, तो अंकगणित या रेखागणित में घण्टों व्यस्त रहने लगा । ऐसा क्यों हुआ ? मन लगाने के लिए रस पैदा करना पड़ता है, रस पैदा हो गया तो मन साथ देता है । संसार भर के प्यार के प्रति हमने रस पैदा किया है, पर प्रभु के प्यार का रस नहीं मिला । इसीलिए मन सन्ध्या के समय भागता है । जिसे ईश्वर के प्यार का रस नहीं मिला, उसे तो सन्ध्या रूखी लगेगी ही, जबरदस्ती तो मन नहीं लगाया जा सकता है । सन्ध्या करने का ढोंग तो रच सकते हैं, पर वह जबरदस्ती की चीज नहीं है । आरम्भ में मन भागेगा, धीरे-धीरे इसका अभ्यास करो, जैसे गणित का, संगीत का, दर्शन शास्त्र का अभ्यास डाला जाता है । व्याकरण रूखा विषय है, भाषाशास्त्र भी रूखा विषय है । पर अभ्यास से रस स्वतः उत्पन्न हो जाता है । प्रभु के प्यार के लिए भी धीरे-धीरे तप, अभ्यास और अन्य आकर्षणों और प्रलोभनों के प्रति वैराग्य इन भोगों से हमें आगे बढ़ना पड़ेगा । जन्मना रुचि तो भाग्यवानों की ही होती है । अनेक पिछले जन्मों के संस्कारों से यह वैराग्य बुद्ध, दयानन्द, शंकराचार्य और थोड़े-से विरलों में ही था । शेष साधारण लोगों को धीरे-धीरे इस ओर अपने चरण आगे बढ़ाने पड़ेगें । ईश्वर के प्यार में जब तुम्हारी आंखें कभी-कभी डबडबाने लगे, अथवा ओठों पर मुसकान आने लगे, तो समझना कि ईश्वर की बातों में तुम्हें रस आने लगा है । और तब हमारा मन सन्ध्या और उपासना में भी लगने लगेगा ।

     .......  स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती ।

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