यदि ऋषि दयानन्द न आते तो क्या होता आर्य समाज मंदिर गया जी

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 ओ३म् “यदि ऋषि दयानन्द न आते तो क्या होता?” ========= ऋषि दयानन्द का जन्म 12 फरवरी, 1825 को गुजरात राज्य के मोरवी जिले के टंकारा कस्बे में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री कर्षनजी तिवारी था। जब उनकी आयु का चौदहवां वर्ष चल रहा था तो उन्होंने अपने  शिवभक्त पिता के कहने पर शिवरात्रि का व्रत रखा था। शिवरात्रि को अपने कस्बे के बाहर कुबेरनाथ के मन्दिर में पिता व स्थानीय कुछ लोगों के साथ उन्होंने रात्रि जागरण करते हुए चूहों को मन्दिर के अन्दर बने हुए बिलों से निकलकर शिवलिंग पर भक्तों द्वारा चढ़ाये गये अन्नादि पदार्थों को खाते देखा था। इससे उनकी शिव की मूर्ति में श्रद्धा, विश्वास एवं आस्था समाप्त हो गई थी। उनमें सच्चे शिव को जानने व प्राप्त करने की इच्छा व संकल्प उत्पन्न हुआ था। उसके बाद उनकी बहिन व चाचाजी की मृत्यु होने पर उन्हें वैराग्य हो गया था। सच्चे शिव को जानने और जन्म व मृत्यु के बन्धन से मुक्त होने के लिए उन्होंने अपनी आयु के बाईसवें वर्ष में गृहत्याग कर दिया था। आरम्भ में वह गुजरात में अनेक स्थानों पर रहकर धार्मिक विद्वानों व योगियों के सम्पर्क में आये थे और उनसे अपने प्रश्नों क...

आर्य समाज में अंतिम संस्कार की प्रक्रिया बहुत ही सरल और वैदिक परंपराओं के अनुसार होती है।

 



आर्य समाज में अंतिम संस्कार की प्रक्रिया बहुत ही सरल और वैदिक परंपराओं के अनुसार होती है। यहाँ कुछ मुख्य बातें हैं 


मृतक को स्नान कराना 

मृतक को गंगाजल या स्वच्छ जल से स्नान कराया जाता है।


- *वस्त्र पहनाना*: मृतक को स्वच्छ वस्त्र पहनाए जाते हैं।

- *अर्थी पर रखना*: मृतक को बांस की अर्थी पर लिटाया जाता है और सफेद वस्त्र से ढक दिया जाता है।


- *मंत्र उच्चारण*: आर्य समाज के लोग वेदों के आधार पर मंत्र उच्चारण करते हुए समसान घाट पर जाते हैं।

- *दाह संस्कार*: मृतक का दाह संस्कार किया जाता है।

और साथ में सुगन्धित सामग्री से वेद मंत्रों द्वारा आहुति भी दी जाती है।


- *अस्थियां एकत्रित करना*: दाह संस्कार के बाद अस्थियों को एकत्रित किया जाता है । 


- *श्राद्ध कर्म*: आर्य समाज में श्राद्ध कर्म नहीं किया जाता है, बल्कि जीवित रहते ही माता-पिता और गुरुओं की सेवा करना ही सच्ची श्रद्धा माना जाता है।


आर्य समाज के अनुसार, मृत्यु के बाद शोक मनाने के बजाय जितनी जल्दी हो सके सामान्य जीवन में लौट जाना चाहिए। इसीलिए आर्य समाज में तीसरे दिन ही शांति पाठ सम्पन्न करा दिया जाता है।

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