सत्याचरण ही सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है

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  ।।सत्याचरण ही सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है।। आचार्य श्री प्रेम आर्य, वैदिक पुरोहित, गया जी, 9304366018 ओ३म् व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्।            दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धाया सत्यमाप्यते।।                                          य०अ०- १९,मं०-३०  भावार्थ-           (व्रतेन) जो मनुष्य सत्य के आचरण को दृढ़ता से करता है, तब वह दीक्षा अर्थात उत्तम अधिकार के फल को प्राप्त करता है।(दीक्षयाप्नोति०) जब मनुष्य उत्तम गुणों से युक्त होता है, तब सब लोग सब प्रकार से उसका सत्कार करते हैं। क्योंकि धर्म आदि शुभ गुणों से ही उस दक्षिणा को मनुष्य प्राप्त होता है, अन्यथा नहीं।(दक्षिणा श्र०) जब ब्रह्मचर्य आदि सत्यव्रतों से अपना और दूसरे मनुष्यों का अत्यंत सत्कार होता है, तब उसी में दृढ़ विश्वास होता है। क्योंकि सत्य धर्म का आचरण ही मनुष्यों का सत्कार करने वाला है।(श्रद्धया) फिर सत्य के आचरण में जितनी जितनी अधिक ...

अच्छी लगती अँग्रेजी पर हिन्दी से परहेज है;


अच्छी लगती अँग्रेजी पर हिन्दी से परहेज है;

बन गये सब अंगरेज  हैं..

खाली खोखला प्रेम दिखाते, भरा अहम लबरेज है;

बन गये सब अंगरेज हैं..


अपने देश मे अपनी भाषा बोलने की आज़ादी है;

इसमें भी कैसी खुन्दस और कैसी भई नाराजी है;

नहीं बोलने देंगे हिन्दी ये कैसा बंधेज है..


हावी अँग्रेजी हमसब पर लेकिन किसी को नहीं दिखता;

उसे रोकने को भी कोई जरा शिकंजा नहीं कसता;

खूब  बोलते  अँग्रेजी दफ्तर स्कूल कॉलेज है..


भिन्न-भिन्न भाषाएँ संस्कृति,मिलजुल यह देश रहा;

नतमस्तक हो आदर करता, प्रेम  भरा  संदेश  रहा;

एक सूत्र में राष्ट्र को जोड़े, हिन्दी की यही इमेज है..


भाषा माँ के जैसी होती, इसमें कोई संदेह नहीं;

एक कुटुंब की आर्य भाषाएँ, फिर 

रखते नेह नहीं; 

हिन्दी सब के मिलन का साधन, केवल यह मैसेज है..


तर्ज़ : ओ३म् नाम का सुमिरन कर ले

 

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