क्या शिवजी को गांजा पीते हुए चित्रित करना सही है?

 क्या शिवजी को गांजा पीते हुए चित्रित करना सही है?


हिन्दू समाज में शिवजी भगवान को कैलाशपति, नीलकंठ आदि नामों से सम्बोधित किया जाता है। नीचे एक चित्र दिया गया है। जिसमें पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शिवजी गांजा का सेवन करते हुए दिखाए गए है।-


वेदों में शिव ईश्वर का एक नाम है जिसका अर्थ कल्याणकारी है एवं एक नाम रूद्र है जिसका अर्थ दुष्ट कर्मों को करने वालो को रुलाने वाला है। वेदों में एक ईश्वर के अनेक नाम गुणों के आधार पर बताये गए हैं। ऐसे में ईश्वर के शिव नामक नाम के आधार पर एक पात्र की कल्पना करना जो गांजा जैसे नशे को ग्रहण करता है। यह अज्ञानता का प्रतीक मात्र है। इसी अज्ञानता में शिव रात्रि के दिन शिव मन्दिरों में प्रसाद के रूप में भांग पिलाई जाती है और पुरूष स्त्रियाँ जिन्होंने कभी नशा न किया हो वे भांग का सेवन श्रद्धा से करते हैं इन ग़लत परंपराओं के चलते समाज को धर्म के नाम पर नशेड़ी बनाने का कार्य हो रहा है। सावन के महीने में कावड़ यात्रा पिछले कुछ वर्षों से विशेष रूप से प्रचलित हो गई है। कावड़ लाने वाले शिव की घुट्टी कहकर भांग/गांजा आदि का सेवन करते है। इसे कुछ लोग नशा सेवन को धार्मिकता बताते है। जबकि यह केवल और केवल अन्धविश्वास है।

मनुस्मृति का सन्दर्भ देकर स्वामी दयानंद यहाँ पर किसी भी प्रकार के नशे से बुद्धि का नाश होना मानते हैं।


वर्जयेन्मधु मानसं च – मनु


जैसे अनेक प्रकार के मद्य, गांजा, भांग, अफीम आदि –

बुद्धिं लुम्पति यद् द्रव्यम मद्कारी तदुच्यते।।

जो-जो बुद्धि का नाश करने वाले पदार्थ हैं उनका सेवन कभी न करें।


स्वामी दयानंद स्पष्ट रूप से शैव नागा साधु के व्यवहार को गलत सिद्ध कर रहे हैं और किसी भी प्रकार के नशे को साधु के लिए वर्जित कर रहे हैं।


नशे का सेवन को भक्ति कहना यह सब असाधु मुर्ख और गर्वगंडों के हैं, साधुयों के नहीं! सुनों !

‘साध्नोती पराणी धर्मकार्याणि स साधु:’


जो धर्म युक्त उत्तम काम करे, सदा परोपकार में प्रवृत हो, कोई दुर्गुण जिसमें न हो, विद्वान, सत्योपदेश से सब का उपकार करे उसको ‘साधु’ कहते हैं।


कुछ लोग भांग के नशे में ईश्वर भक्ति बताते है-मद ( नशा ) की अवस्था में चित्त एकाग्र हो जाता है और जिस विषय की ओर चित्त आकृष्ट होता है उसी में डूबा रहता है । ”


स्वामी दयानंद इस प्रश्न का उत्तर इस प्रकार से देते है-


“समाधि अवस्था में जैसा अच्छा ईश्वर का ध्यान हो सकता है वैसा अन्य अवस्था में नहीं । ”

” इसलिए मद की अवस्था में ईश्वर का ध्यान झूठा और अवगुणों के साथ होता है ”


आप वेदों वाले कल्याणकारी सत्य कल्याणकारी  शिव को मानना चाहते है अथवा पुराणों के काल्पनिक शिव को मानना चाहते है? निर्णय करें । अपना निर्णय कमेंट जरुर करें।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आर्य समाज में अंतिम संस्कार की प्रक्रिया बहुत ही सरल और वैदिक परंपराओं के अनुसार होती है।

शुभ विवाह की वर्षगांठ पर, सौ-सौ बार बधाई हो।

वैदिक संस्कृति बनाम बाज़ार संस्कृति

प्रभु जी इतनी सी दया कर दो, हमको भी तुम्हारा प्यार मिले

धर्म किसे कहते है ? क्या हिन्दू, इस्लाम, आदि धर्म है?