दुनिया बनाने वाले, महिमा तेरी निराली चन्दा बनाया शीतल, सूरज में आग डाली

 *आज का वैदिक भजन* दुनिया बनाने वाले, महिमा तेरी निराली चन्दा बनाया शीतल, सूरज में आग डाली ऊँचे शिखर गिरी के, आकाश चूमते हैं वृक्षों के झुरमुटे भी, वायु में झूमते हैं सरिताऐं बहती कल-कल, निर्मल से नीर वाली चन्दा बनाया शीतल, सूरज में आग डाली दुनिया बनाने वाले फूलों का चूस कर रस, कैसा मधु बनाये मधुमक्खी में भी तूने, क्या यंत्र है लगाये मधु सबके मन को भाये, लाला हो चाहे लाली चन्दा बनाया शीतल, सूरज में आग डाली दुनिया बनाने वाले पत्तों को खा के कीड़ा, रेशम बना रहा है है कौन जो उदर में, चरखा चला रहा है बुन-बुन के आ रहा है, रेशम का लच्छा जाली चन्दा बनाया शीतल, सूरज में आग डाली दुनिया बनाने वाले बरसात के दिनों में, लेंटर टपकते देखा बयें के घोंसले में, पायी न जल की रेखा क्या तकनीकी सिखाई, तूने ओ जग के वाली चन्दा बनाया शीतल, सूरज में आग डाली दुनिया बनाने वाले जुगनू की दुम में तूने, क्या बल्ब है लगाया बरसात की निशा में, जंगल है जगमगाया पक्षी चकोर के क्या, आँखों में कशिश डाली चन्दा बनाया शीतल, सूरज में आग डाली दुनिया बनाने वाले मोरों के पंख देखो, क्या विचित्र चित्रकारी कोयल बनाई काली, आवाज प्या...

आठ प्रकार के कसाई

                     आठ प्रकार के कसाई





अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी।

संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेति घातकाः॥


*अनुमन्ता*  - पशु  को मारने की आज्ञा देने वाला ।

*विशसिता* - मांस को काटने वाला ।

*निहन्ता*    - पशु को मारने वाला ।

*क्रेता*        - पशु को मारने के लिए खरीदने वाला ।

*विक्रेता*    - पशु को मारने के लिए बेचने वाला । 

*संस्कर्ता*   - पकाने वाला ।

*उपहृर्ता*    - परोसने वाला ।

*खादक:*   - खाने वाला ।

ये सभी        - *कसाई , हत्यारे, और पापी हैं ।*


*सभी की मानसिकता और विचारो का अलग अलग होना स्वाभाविक है* 

*क्योंकि कोई मांस खाने वाला है , कोई अंडे खाने वाला है ओर कोई सब्ज़ियाँ खाने वाला है*

*और खाने का निश्चित रूप से हमारी इंद्रियो पर विशेष प्रभाव पढ़ता है मुख्यता: मन पर* 

*जैसा खाओ अन्न , वैसा रहे मन ओर जिसका जैसा अन्न रहेगा उसका वैसा मन रहेगा , वैसे ही विचार रहेंगे वैसे ही स्वभाव रहेगा* 

*और एक और बात वैसे तो सारा शरीर ही अन्न से बनता है पर शरीर अन्न के स्थूल भाग से बनता  है मन सूक्ष्म भाग से जिस भावना अथवा जिस साधन ( तरीक़ा ) से अन्न कमाया जाएगा उसका प्रभाव मन पर अवश्य पड़ता है* 

*यदि अन्न कमाने में झूठ , दम्भ , मक्कारी पर पीड़ा को काम में लाया गया ह तो उस अन्न के खाने वाले पर वैसा ही प्रभाव पड़ेगा यह प्रभाव शीघ्र ही सामने चाहे ना आए पर धीरे धीरे वैसे ही कर्म करने पर हमें बाध्य कर देता है यह निश्चित है* 


*👉 इसलिए मन की सुद्धि के लिए हमारा अन्न शुद्ध हो यह धर्म तथा अपने बाहुबल ओर* *ईमानदारी से कमाया गया हो* 

*और अन्न ऐसा खाया जाए* *जिससे जिससे विकार पैदा ना हो ।तामसिक ना हो* 

*मन एसा शुद्ध होना चाहिए कि अपनी इंद्रियो को खुली छूट ना दे* 

*अगर आँखें देखे तो वो क्या देखे* 

*कान सुने तो वो क्या सुने* 

*वाणी बोले तो क्या बोले* 

*मन ओर बुद्धि सोच ओर विचार करे तो क्या करे* 


वैदिक पुरोहित आचार्य श्री प्रेम आर्य 

9304366018

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