सत्याचरण ही सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है

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  ।।सत्याचरण ही सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है।। आचार्य श्री प्रेम आर्य, वैदिक पुरोहित, गया जी, 9304366018 ओ३म् व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्।            दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धाया सत्यमाप्यते।।                                          य०अ०- १९,मं०-३०  भावार्थ-           (व्रतेन) जो मनुष्य सत्य के आचरण को दृढ़ता से करता है, तब वह दीक्षा अर्थात उत्तम अधिकार के फल को प्राप्त करता है।(दीक्षयाप्नोति०) जब मनुष्य उत्तम गुणों से युक्त होता है, तब सब लोग सब प्रकार से उसका सत्कार करते हैं। क्योंकि धर्म आदि शुभ गुणों से ही उस दक्षिणा को मनुष्य प्राप्त होता है, अन्यथा नहीं।(दक्षिणा श्र०) जब ब्रह्मचर्य आदि सत्यव्रतों से अपना और दूसरे मनुष्यों का अत्यंत सत्कार होता है, तब उसी में दृढ़ विश्वास होता है। क्योंकि सत्य धर्म का आचरण ही मनुष्यों का सत्कार करने वाला है।(श्रद्धया) फिर सत्य के आचरण में जितनी जितनी अधिक ...

अब सौंप दिया इस जीवन का, सब भार तुम्हारे हाथों में ।

अब सौंप दिया इस जीवन का, सब भार तुम्हारे हाथों में ।

है जीत तुम्हारे हाथों में, है हार तुम्हारे हाथों में ।।१।।


मेरा निश्चय है बस एक यही, इक बार तुम्हें पा जाऊँ मैं ।

अर्पण कर दूँ जगती भर का, सब प्यार तुम्हारे हाथों में ।।


या तो मैं जग से दूर रहूँ और जग में रहूँ तो ऐसे रहूँ ।

इस पार तुम्हारे हाथों में, उस पार तुम्हारे हाथों में ।।


 यदि मानुष ही मुझे जन्म मिले, तब तव चरणों का पुजारी बनूँ ।

 मुझ पूजक की इक-इक रग का, हो तार तुम्हारे हाथों में ।।


 जब-जब संसार का बन्दी बन, दरबार तुम्हारे आऊँ मैं । 

हो मेरे पापों का निर्णय, सरकार तुम्हारे हाथों में । ।


मुझ में तुझमें है भेद यही, मैं नर हूँ तू नारायण है । 

मैं हूँ संसार के हाथों में, संसार तुम्हारे हाथों में ।।


https://youtu.be/pmPMb2y3dow





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